राजस्थान के प्रमुख व्यक्तित्व: पुरुष एवं महिला विभूतियाँ राजस्थान का इतिहास विषय के अंतर्गत राव गोपाल सिंह खरवा, बावजी चतुरसिंह (साहित्य), स्वामी केशवानन्द (शिक्षा), पंडित झाबरमल शर्मा (पत्रकारिता), कृपालसिंह शेखावत (ब्लू पॉटरी), गौरीशंकर हीराचंद औझा, विजयदान देथा, कोमल कोठारी, पं. विश्वमोहन भट्ट, आचार्य तुलसी, मेजर पीरू सिंह शेखावत, जयनारायण व्यास, मोहनलाल सुखाड़िया जैसे महान पुरुषों के योगदान को रेखांकित करता है। साथ ही गवरी देवी, बन्नो बेगम, अल्लाह जिलाई बाई, नारायणी देवी, जानकी देवी बजाज, कालीबाई, हाड़ी रानी एवं रानी पद्मिनी जैसी प्रेरणादायी महिला विभूतियों के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रनिर्माण में दिए गए योगदान का भी अध्ययन कराया जाता है।
राजस्थान के प्रमुख व्यक्तित्व
राव गोपाल सिंह खरवा:

- “राव गोपाल सिंह खरवा” का जन्म 1872 में हुआ था और 1939 में उनका निधन हो गया।
- वे राजपूताना की खरवा रियासत के शासक थे।
- अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह करने के आरोप में अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें टॉडगढ़ दुर्ग में चार वर्ष की कैद की सज़ा दी।
- “ठाकुर केसरी सिंह बारहठ” ने उनके बारे में कहा कि जैसे पंजाब को लाला लाजपत राय पर और महाराष्ट्र को बाल गंगाधर तिलक पर गर्व है, वैसे ही राजस्थान को राव गोपाल सिंह खरवा पर गर्व है।
- वर्ष 1910 में “केसरी सिंह बारहठ”, “विजयसिंह पथिक” और “राव गोपाल सिंह खरवा” ने मिलकर वीर भारत सभा नामक संगठन की स्थापना की।
बावजी चतुरसिंह (साहित्यकार)
- “बावजी चतुरसिंह” राजस्थान के प्रसिद्ध साहित्यकार थे।
- उनकी रचनाएँ आम लोगों के जीवन और राजस्थान की संस्कृति से जुड़ी हुई थीं।
- उनके साहित्य ने राजस्थान की साहित्यिक धरोहर को और अधिक समृद्ध और मजबूत बनाया।
स्वामी केशवानन्द (शिक्षा क्षेत्र)
- “स्वामी केशवानन्द” का जन्म 1883 ईस्वी में सीकर ज़िले के मंगलूणा गाँव में हुआ था।
- इनके पिता का नाम चौधरी ठाकरसी था और बचपन में उनका नाम बीरमा था।
- लोगों ने उन्हें उनकी शिक्षा-सेवा के कारण “शिक्षा संत” की उपाधि दी।
- उन्होंने 1944 से 1956 के बीच बीकानेर के रेगिस्तानी गाँवों में लगभग 300 पाठशालाएँ खुलवाने में मदद की।
- उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा फैलाने और गाँवों के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया।
पंडित झाबरमल शर्मा (पत्रकारिता)

- “पं. झाबरमल शर्मा” का जन्म 1880 ईस्वी में जसरापुर नामक स्थान पर हुआ था।
- उन्हें राजस्थान में “पत्रकारिता के भीष्म पितामह” के नाम से सम्मानित किया जाता है।
- उन्होंने वर्ष 1905 में पंडित दुर्गाप्रसाद मिश्र से हिंदी पत्रकारिता और संपादन का प्रशिक्षण लिया।
- उन्होंने अपने लेखन और संपादन के माध्यम से राजस्थान में विचार-जागृति और राष्ट्रीय चेतना फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कृपालसिंह शेखावत (ब्लू पॉटरी – शिल्पगुरु)

- “कृपालसिंह शेखावत” का जन्म 1922 ईस्वी में सीकर ज़िले के मऊ गाँव में हुआ था।
- उन्हें उनकी कला के कारण “शिल्पगुरु” की उपाधि दी गई।
- उन्होंने ब्लू पॉटरी पर सुंदर चित्रकारी करके इस पारंपरिक कला को पूरे देश और विदेश में पहचान दिलाई।
- उनकी कला के लिए उन्हें 1974 ईस्वी में “पद्मश्री” पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
- उन्होंने राजस्थान की हस्तशिल्प परंपरा को फिर से जीवित और लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
गौरीशंकर हीराचंद औझा

- “गौरीशंकर हीराचंद औझा” का जन्म 1863 ईस्वी में सिरोही ज़िले के रोहिड़ा गाँव में हुआ था।
- वे राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार और पुरातत्त्वविद् थे।
- उन्होंने राजस्थान के इतिहास पर गहरा और गंभीर अध्ययन किया।
- उन्होंने प्राचीन शिलालेखों और अभिलेखों को खोजकर उन्हें एकत्रित और अध्ययन किया।
- उनके योगदान के कारण उन्हें “राजस्थान का इतिहासकार” कहा जाता है।
कविराज श्यामलदास

- “कविराज श्यामलदास” का जन्म 1836 ईस्वी में भीलवाड़ा ज़िले के सालीवाड़ा ढोकलिया गाँव में हुआ था।
- वे मेवाड़ के महाराणा शम्भूसिंह और सज्जनसिंह के दरबार में दरबारी कवि थे।
- उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति का नाम “वीर विनोद” है, जो राजस्थान के इतिहास पर लिखी गई एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।
- उन्होंने मेवाड़ दरबार में रहते हुए अपने ऐतिहासिक ग्रंथों के माध्यम से राजस्थान के इतिहास को सुरक्षित और संरक्षित करने का काम किया।
विजयदान देथा

- “विजयदान देथा” का जन्म 1 सितम्बर 1926 को जोधपुर ज़िले के बोरूंदा गाँव में हुआ था।
- उन्हें प्रेम से “बिज्जी” के नाम से पुकारा जाता था।
- उन्होंने चौधरायन की चतुराई, बातां री फुलवारी, दुविधा, अलेखू हिटलर जैसी प्रसिद्ध रचनाएँ लिखीं।
- उन्होंने राजस्थान की लोककथाओं को सुंदर भाषा में लिखकर उन्हें आधुनिक साहित्य में विशेष स्थान दिलाया।
- उनके योगदान के लिए उन्हें 1974 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 2007 में पद्मश्री और 2012 में राजस्थान रत्न से सम्मानित किया गया।
कोमल कोठारी

- “कोमल कोठारी” का जन्म 4 मार्च 1929 को चित्तौड़गढ़ ज़िले के कपासन में हुआ था।
- उन्होंने 1960 ईस्वी में जोधपुर ज़िले के बोरूंदा कस्बे में “रूपायन संस्थान” की स्थापना की।
- उन्होंने राजस्थान की लोककला, लोकसंगीत और लोकसंस्कृति को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए लगातार काम किया।
- वे लोक संस्कृति के शोधकर्त्ता (फोकलोरिस्ट) के रूप में पूरे देश में प्रसिद्ध हुए।
पं. विश्वमोहन भट्ट

- “पंडित विश्वमोहन भट्ट” एक विख्यात भारतीय शास्त्रीय संगीतज्ञ हैं।
- उन्होंने मोहन वीणा नामक विशेष वाद्ययंत्र का आविष्कार किया, जिसमें गिटार के साथ सितार, सरोद और वीणा के तारों का सुंदर मेल है।
- उन्हें वर्ष 1994 में ग्रैमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
- उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध बनाने में अहम भूमिका निभाई।
आचार्य तुलसी
- “आचार्य तुलसी” का जन्म 20 अक्टूबर 1914 को नागौर ज़िले के लाडनूं कस्बे में हुआ था।
- वे केवल 22 वर्ष की आयु में तेरापंथ संघ के नवें आचार्य बने।
- उन्होंने “अणुव्रत आंदोलन” शुरू किया, जिसमें छोटे-छोटे व्रतों के माध्यम से नैतिक जीवन जीने पर जोर दिया गया।
- वे यह संदेश देते थे – “इन्सान पहले इन्सान है, बाद में हिन्दू या मुसलमान।”
- उन्होंने समाज में नैतिकता, अहिंसा और मानवीय एकता को बढ़ावा दिया।
मेजर पीरू सिंह शेखावत

- “मेजर पीरू सिंह शेखावत” परमवीर चक्र पाने वाले पहले राजस्थानी सैनिक थे।
- उन्होंने 1947–48 के भारत–पाक युद्ध में जम्मू–कश्मीर के झंगार क्षेत्र में अद्भुत वीरता दिखाई।
- युद्ध के दौरान वे वीरगति को प्राप्त हुए, इसलिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया।
- उनकी वीरता को राजस्थान के लोग गौरव और प्रेरणा के रूप में याद करते हैं।
जमनालाल बजाज

- “जमनालाल बजाज” का संबंध सीकर ज़िले के काशी का बास गाँव से था।
- महात्मा गांधी ने स्नेहपूर्वक उन्हें अपना “पाँचवाँ पुत्र” कहा।
- उन्होंने 1921 में वर्धा में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की।
- 1925 में उन्होंने चरखा संघ की स्थापना की और खादी को बढ़ावा दिया।
- वे हिन्दी भाषा को बहुत महत्व देते थे और उसे “धर्म की भाषा” कहते थे।
जयनारायण व्यास

- “जयनारायण व्यास” का जन्म 1899 में जोधपुर में हुआ था।
- उन्हें लोकनायक, शेर-ए-राजस्थान और मास्साब जैसे सम्मानजनक उपनामों से जाना जाता है।
- उन्होंने 1924 में मारवाड़ हितकारिणी सभा, 1927 में तरुण राजस्थान पत्रिका और 1936 में अखण्ड भारत पत्रिका (मुंबई) की शुरुआत में योगदान दिया।
- वे राजस्थान के मुख्यमंत्री मनोनीत भी बने और बाद में निर्वाचित मुख्यमंत्री भी रहे।
मोहनलाल सुखाड़िया
- “मोहनलाल सुखाड़िया” को “आधुनिक राजस्थान का निर्माता” कहा जाता है।
- उन्होंने लगभग 17 वर्षों तक राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया।
- यह समयावधि राजस्थान के इतिहास में सबसे लम्बे मुख्यमंत्री कार्यकाल के रूप में जानी जाती है।
हरिभाऊ उपाध्याय
- “हरिभाऊ उपाध्याय” अजमेर राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बने।
- उन्होंने हटूण्डी (अजमेर) में गांधी आश्रम की स्थापना की।
- उन्होंने महिला शिक्षा सदन की स्थापना करके महिलाओं की शिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण काम किया।
गोकुलभाई भट्ट
- “गोकुलभाई भट्ट” को “राजस्थान का गांधी” कहा जाता है।
- उन्होंने वर्ष 1939 में सिरोही प्रजामण्डल की स्थापना की।
- वे सादगीपूर्ण जीवन, सत्य और अहिंसा के लिए प्रसिद्ध थे।
बलवन्त सिंह मेहता
- “बलवन्त सिंह मेहता” का जन्म 1900 ईस्वी में उदयपुर में हुआ था।
- उन्होंने 1915 में प्रताप सभा, 1938 में मेवाड़ प्रजामण्डल की स्थापना में भूमिका निभाई।
- 1943 में उन्होंने उदयपुर में वनवासी छात्रावास की स्थापना की, जहाँ आदिवासी विद्यार्थियों की शिक्षा पर ध्यान दिया गया।
टीकाराम पालीवाल
- “टीकाराम पालीवाल” ने 1929 में विद्यार्थी यूथ लीग, दिल्ली में सक्रिय भूमिका निभाई।
- वर्ष 1957 में वे राजस्थान के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री बने।
वैद्य मेघाराम
- “वैद्य मेघाराम” बीकानेर रियासत में आज़ादी आंदोलन के जनक माने जाते हैं।
- उन्होंने 1936 में बीकानेर प्रजामण्डल की स्थापना की।
- 1946 में वे बीकानेर राज्य प्रजा परिषद् के अध्यक्ष बने।
सरदार हरलाल सिंह
- “सरदार हरलाल सिंह” का जन्म 1901 में झुंझुनूं ज़िले में हुआ था।
- उन्होंने विद्यार्थी भवन, झुंझुनूं की स्थापना की, जिसे राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बना दिया।
- वे किसान आंदोलनों और प्रजामण्डल आंदोलनों में सक्रिय रहे।
- उनके साहस और नेतृत्त्व के कारण लोगों ने उन्हें “सरदार” की उपाधि दी।
कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी
- “कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी” का जन्म 1906 में नीमकाथाना क्षेत्र में हुआ था।
- उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अर्जुनलाल सेठी की वर्धमान पाठशाला से प्राप्त की।
- वे राजस्थान सेवा संघ से जुड़कर स्वतंत्रता आंदोलन और किसान आंदोलनों में सक्रिय रहे।
- बाद में वे दैनिक नवज्योति नामक समाचार पत्र के संपादक बने।
राजस्थान की प्रमुख महिला विभूतियाँ
गवरी देवी (बीकानेर / जोधपुर)
- “गवरी देवी” का जन्म बीकानेर में हुआ था।
- वे जोधपुर राजघराने की प्रसिद्ध मांड गायिका थीं।
- उन्हें महाराजा उम्मेद सिंह के समय सबसे अधिक प्रसिद्धि प्राप्त हुई।
- वर्ष 1954 में उन्होंने अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन, जयपुर में भाग लिया।
- उन्हें “राजस्थान की कोकिला” और “मांड मलिका” की उपाधियाँ दी गईं।
- उनका संबंध पाली से भी माना जाता है और वे भैरवी युक्त मांड गायन के लिए प्रसिद्ध थीं।
बन्नो बेगम” (जयपुर)
- “बन्नो बेगम” जयपुर की प्रसिद्ध गायिका थीं।
- वे शास्त्रीय संगीत, मांड, ठुमरी, गीत और गजल गायन में निपुण थीं।
- उनकी माता “जौहरबाई” जयपुर दरबार की प्रसिद्ध गायिका थीं।
- वे जयपुर गुणीजन खाना की सदस्य थीं।
- उनके गुरु का नाम नजीन खाँ था।
- उन्होंने राजमाता गायत्री देवी और इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ के सामने भी प्रस्तुति दी थी।
माँगीबाई (उदयपुर / प्रतापगढ़)
- “माँगीबाई” का जन्म प्रतापगढ़ में हुआ था।
- वे मांड और शास्त्रीय गायन की कुशल गायिका थीं।
- उन्हें उनके संगीत योगदान के लिए 1994 में सम्मानित किया गया।
अल्लाह जिलाई बाई (बीकानेर)

- “अल्लाह जिलाई बाई” बीकानेर राजघराने से जुड़ी प्रसिद्ध मांड गायिका थीं।
- उन्हें “मरु कोकिला” की उपाधि दी गई थी।
- उनके गुरु का नाम उस्ताद हुसैन बक्स था।
- उन्हें 1982 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
- उन्हें मेवाड़ फाउंडेशन का डागर घराना पुरस्कार भी मिला।
- वर्ष 1987 में उन्होंने अल्बर्ट हॉल, लंदन में प्रस्तुति दी।
- वर्ष 2003 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में ₹5 का डाक टिकट जारी किया।
- उनके प्रसिद्ध गीतों में “केसरिया बालम” और “बाईसा रा वीरा” प्रमुख हैं।
जमीला बानो (जोधपुर) –
- “जमीला बानो” जोधपुर की प्रसिद्ध गायिका थीं।
- वे राजस्थान की मांड गायन परंपरा से जुड़ी हुई थीं।
किशोरी देवी –
- “किशोरी देवी” स्वतंत्रता सेनानी सरदार हरलाल सिंह की पत्नी थीं।
- उन्होंने 25 अप्रैल 1934 को कटराथल सम्मेलन की अध्यक्षता की थी।
नारायणी देवी
- “नारायणी देवी”, माणिक्यलाल वर्मा की पत्नी थीं।
- उन्होंने 1944 में भीलवाड़ा में महिला आश्रम की स्थापना की।
- वे 1970 से 1976 तक राज्यसभा की सदस्य रहीं।
- उन्होंने डूंगरपुर रियासत के ख़ांडलाई क्षेत्र में भील समाज में शिक्षा और जागरूकता का प्रसार किया।
- वर्ष 1939 में उन्होंने प्रजामण्डल आंदोलनों में भाग लिया और जेल गईं।
- वर्ष 1942 में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और पुनः जेल गईं।
- स्नेहलता वर्मा –
- “स्नेहलता वर्मा”, स्वतंत्रता सेनानी माणिक्यलाल वर्मा की पुत्री थीं।
- उन्होंने अपने पिता के नेतृत्त्व में बिजौलिया किसान आंदोलन में भाग लिया।
रतन शास्त्री
- “रतन शास्त्री”, राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री की पत्नी थीं।
- उन्होंने 1939 में जयपुर राज्य प्रजामण्डल सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया।
- वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने भूमिगत कार्यकर्त्ताओं और उनके परिवारों की सेवा की।
- उन्हें 1955 में पद्मश्री सम्मान मिला।
- उन्हें जमनालाल बाजाज पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
- वर्ष 1975 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।
- उनका प्रमुख योगदान महिला एवं बाल कल्याण के क्षेत्र में रहा।
अंजना देवी
- “अंजना देवी”, स्वतंत्रता सेनानी रामनारायण चौधरी की पत्नी थीं।
- उन्होंने बिजौलिया और बूंदी किसान सत्याग्रह में महिलाओं का नेतृत्त्व किया।
- उन्होंने लगभग 500 महिलाओं का दल बनाकर अवैध रूप से गिरफ्तार किसानों को छुड़ाया।
- उन्होंने 1930 के नमक सत्याग्रह में भाग लिया और 6 महीने की जेल काटी।
- उन्होंने भारत सेवक समाज के महिला सूचना केंद्र में भी सेवाएँ दीं।
नगेन्द्रबाला
- “नगेन्द्रबाला”, महान क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहठ की पौत्री थीं।
- वे 1941 से 1947 तक किसान आंदोलनों में सक्रिय रहीं।
- स्वतंत्रता के बाद वे राजस्थान की पहली महिला जिला प्रमुख (कोटा) बनीं।
- वे विधानसभा की सदस्य भी रहीं।
जानकी देवी बजाज
- “जानकी देवी बजाज” का जन्म जावरा (मध्यप्रदेश) में हुआ था।
- वे जमनालाल बजाज की पत्नी थीं।
- वर्ष 1944 में उन्होंने जयपुर प्रजामण्डल अधिवेशन की अध्यक्षता की।
- उन्होंने भूदान आंदोलन के दौरान 108 कुएँ खुदवाए।
- उन्हें 1956 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया।
शांता त्रिवेदी
- “शांता त्रिवेदी” का जन्म नागपुर (महाराष्ट्र) में हुआ था।
- उनके पति का नाम परसुराम त्रिवेदी था, जो उदयपुर के निवासी थे।
- उन्होंने 1947 में उदयपुर में राजस्थान महिला परिषद् की स्थापना की।
- मिस लूटर (लिलियन गोडाफ्रेडा डामीथ्रोन लूटर) –
- “मिस लूटर” का जन्म क्यामो (बर्मा) में हुआ था।
- वे 1934 में महारानी गायत्री देवी स्कूल, जयपुर की पहली प्राचार्य बनीं।
- वे जीवनभर उसी विद्यालय की प्राचार्य रहीं।
- उन्हें 1970 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
- 1976 में उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा महिला शिक्षा के लिए सम्मान दिया गया।
कालीबाई (भील कन्या)

- “कालीबाई” डूंगरपुर ज़िले के रास्तापाल गाँव की निवासी थीं।
- वर्ष 1947 में वे अपने शिक्षक को बचाते समय पुलिस की गोली से शहीद हो गईं।
- उनकी स्मृति में रास्तापाल में स्मारक बनाया गया है।
- श्रीमती सत्यभामा –
- “श्रीमती सत्यभामा”, बूंदी के सेनानी नित्यानंद नागर की पुत्रवधू थीं।
- उन्होंने 1932 में ब्यावर–अजमेर आंदोलन का नेतृत्त्व किया।
- उन्हें महात्मा गांधी की मानस पुत्री कहा जाता था।
- कमला देवी –
- “कमला देवी” राजस्थान की पहली महिला पत्रकार थीं।
- उन्होंने ‘प्रकाश’ समाचार पत्र से अपने लेखन कार्य की शुरुआत की।
- खेतूबाई –
- “खेतूबाई”, बीकानेर के स्वतंत्रता सेनानी वैद्य मेघाराम की बहन थीं।
- उन्होंने दूधवा खारा किसान आंदोलन में महिलाओं का नेतृत्त्व किया।
- उन्होंने जीवनभर खादी पहनने की प्रतिज्ञा निभाई।
रमा देवी
- “रमा देवी” का जन्म जयपुर में वैद्य गंगासहाय के घर हुआ था।
- वे 11 वर्ष की आयु में विधवा हो गई थीं।
- बाद में उनका विवाह लादूराम जोशी से हुआ।
- उन्होंने 1931 में बिजौलिया आंदोलन में भाग लिया और जेल गईं।
- लक्ष्मीदेवी आचार्य –
- “लक्ष्मीदेवी आचार्य” बीकानेर प्रजामण्डल की संस्थापक सदस्य और अध्यक्ष थीं।
- वे सविनय अवज्ञा आंदोलन और स्वदेशी आंदोलन में सक्रिय रहीं।
- विजया बहन भावसार –
- विजया बहन भावसार” का विवाह बांसवाड़ा के सेनानी धूलजी भावसार से हुआ था।
- उन्होंने ‘महिला मण्डल’ की स्थापना की।
- पन्नाधाय –
- “पन्नाधाय” चित्तौड़ की वीरांगना थीं।
- उन्होंने 1537 ई. में उदयसिंह की रक्षा के लिए अपने पुत्र चंदन का बलिदान दिया।
- गोरां धाय –
- “गोरां धाय” जोधपुर से संबंधित थीं।
- उन्होंने अजीतसिंह की रक्षा के लिए अपने पुत्र का बलिदान दिया।
हाड़ी रानी (सहल कंवर)

- “हाड़ी रानी”, सलूम्बर के रतनसिंह चुण्डावत की पत्नी थीं।
- उन्होंने युद्ध पर जाते पति को अपना कटा हुआ सिर भेंट किया।
रानी पद्मिनी (पद्मावती)
- “रानी पद्मिनी” चित्तौड़ की रानी थीं।
- उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी से सम्मान की रक्षा हेतु जौहर किया।
अरुणा रॉय –
- “अरुणा रॉय” का योगदान RTI और NREGA कानून के निर्माण में रहा है।
- उन्हें रैमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सुमित्रा सिंह –
- “सुमित्रा सिंह” राजस्थान की प्रथम महिला विधानसभा अध्यक्ष बनीं।
कुशल सिंह –
- वर्ष 2009 में “कुशल सिंह” राजस्थान की प्रथम महिला मुख्य सचिव बनीं।
यशोदा देवी –
- “यशोदा देवी” बांसवाड़ा की प्रथम महिला विधायक थीं।
शारदा भार्गव –
- “शारदा भार्गव” राजस्थान की प्रथम महिला सांसद (राज्यसभा) बनीं।
प्रतिभा पाटिल –
- “प्रतिभा पाटिल” राजस्थान की प्रथम महिला राज्यपाल बनीं।
- वे भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति भी रहीं।
भक्ति शर्मा –
- “भक्ति शर्मा” उदयपुर की प्रसिद्ध तैराक हैं।
- वे इंग्लिश चैनल पार करने वाली पहली राजस्थानी महिला तैराक हैं।
कृष्णा पूनिया –
- “कृष्णा पूनिया” एक प्रसिद्ध डिस्कस थ्रो खिलाड़ी हैं।
- उन्होंने 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता।
- उन्हें 2011 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
अपूर्वी चंदेला –
- “अपूर्वी चंदेला” भारत की प्रसिद्ध निशानेबाज हैं।
- उन्होंने 2014 के कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीता।
- उन्हें 2016 में अर्जुन पुरस्कार मिला।
तनुश्री पारीक –
- “तनुश्री पारीक” ने वर्ष 2014 में UPSC परीक्षा उत्तीर्ण की।
- वे BSF की पहली महिला असिस्टेंट कमांडेंट बनीं।
