बीकानेर व किशनगढ़ के राठौड़

बीकानेर और किशनगढ़ के राठौड़ राजवंश राजस्थान का इतिहास अनेक शक्तिशाली राजवंशों से समृद्ध है, जिनमें राठौड़ वंश का विशेष स्थान है। बीकानेर और किशनगढ़ में राठौड़ों ने राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ी, जिससे यह क्षेत्र ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गया। इन राजाओं की वीरता और प्रशासनिक कुशलता आज भी राजस्थान के इतिहास में गौरवशाली रूप में याद की जाती है।

राव बीका (1465–1504 ई.) – 

  • राव बीका बीकानेर के राठौड़ वंश के संस्थापक थे।
  • वे मारवाड़ के शासक राव जोधा के पुत्र थे।
  • 1488 ई. में करणी माता के आशीर्वाद से “अक्षय तृतीया” के दिन बीकानेर राज्य की स्थापना की गई।
  • आज भी “अक्षय तृतीया” के दिन बीकानेर में हर्षोल्लास के साथ पर्व मनाया जाता है तथा पतंगें उड़ाई जाती हैं।
  • राव बीका ने कोडमदेसर (बीकानेर) में भैरव मंदिर का निर्माण करवाया।
  • उन्होंने पुंगल के राव शेखा की पुत्री से विवाह कर अपनी राजनीतिक शक्ति को मजबूत किया।
  • बीकानेर को राठौड़ सत्ता का “दूसरा” केन्द्र माना जाता है।
  • राव बीका ने स्थानीय शक्तियों (भाटी, चौहान, खींची, कायमखानी) की फूट का लाभ उठाकर अनेक गाँवों पर अधिकार स्थापित किया।
  • उन्होंने देशनोक में करणी माता के मूल मंदिर का निर्माण करवाया।
  • करणी माता मंदिर को वर्तमान स्वरूप महाराजा सूरतसिंह ने प्रदान किया।
  • नोट – एक मान्यता के अनुसार राव बीका और जाट नेता नरा ने मिलकर जांगल प्रदेश को जीता तथा इन्हीं के नाम पर इस क्षेत्र का नाम बीकानेर पड़ा।
राव नरा (1504–1505 ई.) – 
  • राव नरा, राव बीका का ज्येष्ठ पुत्र था।
  • 1505 ई. में राव नरा का देहान्त हो गया।

लूणकरण (1505–1526 ई.) – 

  • लूणकरण, राव बीका का छोटा पुत्र था।
  • उसका उपनाम “कलयुग का कर्ण” प्रचलित था।
  • बीठू सूजा ने “राव जैतसी रो छन्द” में लूणकरण की दानशीलता और वीरता की प्रशंसा की है।
  • जयसोम ने “कर्मचन्द्रवंशोत्कीर्तन काव्यम्” ग्रंथ में उसकी दानशीलता की तुलना महाभारत के कर्ण से की है।
  • लूणकरण ने नागौर के शासक मुहम्मद खाँ तथा लोद्रवा के मानसिंह को पराजित किया।
  • उसने अपनी पुत्री बालाबाई का विवाह आमेर के पृथ्वीराज कच्छवाहा के साथ किया।
  • लूणकरण ने लूणकरणसर झील का निर्माण करवाया।
  • 1526 ई. में “ढोसी के युद्ध” में नारनौल (हरियाणा) के नवाब अबीमीरा से लड़ते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुआ।

राव जैतसी (1526–1541 ई.)- 

  • राव जैतसी के समकालीन शासक राव गांगा, मालदेव, राणा सांगा, बाबर, हुमायूँ तथा शेरशाह सूरी थे।
  • 1527 ई. में खानवा के युद्ध में राणा सांगा की सहायता के लिए उसने अपने पुत्र कल्याणमल्ल के नेतृत्त्व में बीकानेर की सेना भेजी।
  • 1534 ई. में उसने काबुल के मुगल शासक कामरान (जो हुमायूँ का भाई था) को पराजित किया।
  • मारवाड़ के शासक मालदेव द्वारा बीकानेर पर आक्रमण किए जाने पर राव जैतसी ने अपने मंत्री नगराज को शेरशाह से सहायता लेने के लिए भेजा।
  • शेरशाह की सहायता मिलने से पूर्व 1541 ई. में वह साहेबा/पाहेबा के युद्ध (जोधपुर) के युद्ध में मालदेव से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
  • उसका दरबारी विद्वान बीठू सूजा था।
  • बीठू सूजा ने “राव जैतसी रो छन्द” नामक ग्रंथ की रचना की।
  • इस युद्ध के बाद उसका पुत्र कल्याणमल्ल राज्य प्राप्ति हेतु शेरशाह सूरी की शरण में चला गया।

राव कल्याणमल (1541–1574 ई.) – 

  • राव कल्याणमल के समकालीन शासक शेरशाह सूरी, हुमायूँ, अकबर, मालदेव, चन्द्रसेन, उदयसिंह तथा प्रताप थे।
  • 1541 ई. में राव कल्याणमल ने शेरशाह सूरी की अधीनता स्वीकार की।
  • 1570 ई. में नागौर दरबार में उसने अकबर की अधीनता स्वीकार की और वह अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाला प्रथम राठौड़ शासक बना।
  • राव कल्याणमल ने अपनी पुत्री का विवाह अकबर से किया।
  • उसने अपने दोनों पुत्र पृथ्वीराज राठौड़ और रायसिंह को अकबर की सेवा में नियुक्त किया।

पृथ्वीराज राठौड़ – 

  • पृथ्वीराज राठौड़ का उपनाम “डिंगल का हैरोस” था, जिसका उल्लेख इटली के विद्वान एल.पी. टेस्सीटोरी ने किया है।
  • उसकी प्रमुख रचना “वेलि किसन रुकमणी रीं” मानी जाती है, जिसे दुरसा आढ़ा ने “पाँचवाँ वेद” कहा और यह कृति गागरोण दुर्ग में लिखी गई।
  • राजस्थानी साहित्य में पृथ्वीराज को “पीथल” कहा गया है।
  • वह अकबर के दरबार का कवि था।
  • अकबर ने उसे गागरोण का किला इनाम में प्रदान किया।
  • उसकी अन्य प्रमुख रचनाओं में कल्ला रायमलोत के मरसिये, “गंगा लहरी”, “दशरथ वराउत” तथा “दशम भागवत” का दूहा सम्मिलित हैं।

महाराजा रायसिंह (1574–1612 ई.) –

  • 1572 ई. में अकबर ने रायसिंह को जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया, और 1572 से 1574 ई. तक उसने वहाँ प्रशासन संभाला।
  • 1570 ई. में उसे औपचारिक रूप से अकबर की सेवा में नियुक्त किया गया था।
  • 1573 ई. में गुजरात के मिर्जा बंधुओं के दमन हेतु भेजी गई शाही सेना में रायसिंह सम्मिलित हुआ।
  • कठौली के युद्ध में उसने इब्राहिम हुसैन मिर्जा को पराजित किया।
  • 1574 ई. में अकबर ने उसे “महाराजाधिराज” की उपाधि देकर बीकानेर का शासक बनाया।
  • सिरोही के देवड़ा सुरताण और बीजा देवड़ा के विवाद में उसने मध्यस्थ के रूप में हस्तक्षेप किया।
  • 1583 ई. के दत्ताणी युद्ध में जगमाल मारा गया, जो उसी काल की घटना है।
  • 1581 ई. में उसे काबुल में मानसिंह कच्छवाहा की सहायता हेतु भेजा गया।
  • रायसिंह ने बलूचिस्तान के विद्रोह का भी दमन किया।
  • 1591 ई. में कंधार के विद्रोह को दबाने के लिए उसे पुनः मुगल सेना के साथ भेजा गया।
  • 1593 ई. के थट्टा अभियान में वह सक्रिय रूप से सम्मिलित रहा।
  • 1599 और 1603 ई. के मेवाड़ अभियानों में वह सलीम के साथ रहा।
  • 1593 ई. में उसे जूनागढ़ की जागीर तथा 1604 ई. में शमशाबाद और नूरपुर की जागीर प्रदान की गई।
  • जहाँगीर का विश्वास मानसिंह की तुलना में रायसिंह पर अधिक था।
  • जहाँगीर ने उसका मनसब 4000 से बढ़ाकर 5000 कर दिया।
  • खुसरो के विद्रोह के समय राजधानी आगरा की सुरक्षा की जिम्मेदारी रायसिंह को दी गई थी, किंतु वह बीच में ही बीकानेर लौट आया।
  • 1577 ई. में अकबर ने रायसिंह को 71 परगने जागीर के रूप में प्रदान किए।
  • 1612 ई. में रायसिंह की मृत्यु बुरहानपुर (दक्षिण भारत) में  हुई।

महाराजा सूरसिंह (1613–1631 ई.) – 

  • महाराजा सूरसिंह मुगलों के शक्तिशाली सहयोगी शासक थे।
  • 1622 ई. में खुर्रम (शाहजहाँ) के विद्रोह का दमन किया।
  • 1628 ई. में जुझार सिंह बुंदेला के विद्रोह का दमन किया।
  • 1629–30 ई. में खानेजहाँ लोदी के विद्रोह को दबाने में मुगलों की सहायता की।

महाराजा कर्णसिंह (1631–1669 ई.) – 

  • शाहजहाँ के दक्षिण अभियानों में महाराजा कर्णसिंह की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
  • 1644 ई. में अमरसिंह राठौड़ (गजसिंह का पुत्र) से “मतीरे की राड़” हुई।
  • महाराजा कर्णसिंह को “जांगलधर बादशाह” की उपाधि प्राप्त हुई।
    • यह उपाधि मुगल बादशाह औरंगजेब द्वारा प्रदान की गई।
  • कर्णसिंह से संबंधित जानकारी चिंतामणि भट्ट के ग्रंथ “शुकसप्तति” से प्राप्त होती है।
  • महाराजा कर्णसिंह की रचना “साहित्य कल्पद्रुम” मानी जाती है।
  • इसके दरबारी विद्वान गगानंद मैथिल (कर्णभूषण) तथा होसिक भट्ट (कर्णवंतस) थे।

महाराजा अनूपसिंह (1669–1698 ई.) – 

  • 1670 ई. में औरंगजेब ने अनूपसिंह को मराठों के विरुद्ध भेजा।
  • उसकी वीरता से प्रभावित होकर औरंगजेब ने उसे “महाराजा” तथा “माही मरातिब” की उपाधियाँ प्रदान कीं।
  • 1685–86 ई. में उसने बीजापुर अभियान में भाग लिया।
  • 1687 ई. में वह गोलकुंडा के घेरे में मुगल सेना के साथ सम्मिलित रहा।
  • दक्षिण भारत से लाई गई मूर्तियाँ उसने बीकानेर के 33 करोड़ देवताओं के मंदिर में स्थापित करवाईं।
  • बीकानेर में अनुप संस्कृत पुस्तकालय की स्थापना करवाई।
  • बीकानेर में 33 करोड़ देवी–देवताओं के मंदिर का निर्माण करवाया।
  • अनूपसिंह के काल को बीकानेर चित्रकला का स्वर्णकाल माना जाता है।
  • इस काल में दक्षिण भारतीय कला का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
  • अनूपसिंह स्वयं विद्वान था तथा उसकी रचनाएँ काम प्रबौध, अनुपोदय(गीत गोविंद पर टीका), अनुप विवेक तथा श्राद्ध प्रयोग चिंतामणि मानी जाती हैं।
  • इसके प्रमुख दरबारी विद्वान भावभट्ट, मणिराम तथा अनंत भट्ट थे।
  • आनंद राम ने गीता का मारवाड़ी भाषा में गद्य–पद्य में प्रथम अनुवाद किया।
राव स्वरूपसिंह (1698–1700 ई.) – 
  • राव स्वरूपसिंह का शासनकाल अल्पकालीन रहा।
महाराजा सुजानसिंह (1700–1735 ई.) – 
  • महाराजा सुजानसिंह के समय बीकानेर राज्य में प्रशासनिक स्थिरता बनी रही।
जोरावर सिंह (1735–1746 ई.) – 
  • जोरावर सिंह द्वारा “वैद्यकसार” तथा “पूजा पद्धति” नामक रचनाएँ लिखी गईं।
  • इनके शासनकाल में राजमाता सिसोदणी ने बीकानेर में चतुर्भुज मंदिर का निर्माण करवाया।

महाराजा गजसिंह (1746–1787 ई.) – 

  • महाराजा गजसिंह नागौर के अमरसिंह का भाई था।
  • वह स्वयं कभी मुगल दरबार में उपस्थित नहीं हुआ।
  • इनके समय बीकानेर शहर का नगर-कोट (परकोटा) बनवाया गया।
  • अवध के नवाब सफदरजंग को दबाने हेतु उसने मुगल सेना के साथ अपनी सेना भेजी।
  • मुगल बादशाह ने उसे 7000 का मनसब प्रदान किया।
  • उसे “श्री राजराजेश्वर महाराजाधिराज महाराजा शिरोमणि श्री गजसिंह” की उपाधि दी गई।
महाराजा राजसिंह – 
  • महाराजा राजसिंह का शासनकाल लगभग 21 दिनों का रहा।
  • इनके विश्वासपात्र सेवक मंडलावत संग्रामसिंह इनके साथ चिता में कूदकर प्राणों की आहुति दी।
महाराजा प्रतापसिंह (मई 1787 – अक्टूबर 1787) – 
  • महाराजा प्रतापसिंह की हत्या के बाद सूरतसिंह बीकानेर का शासक बना।

महाराजा सूरतसिंह (1781–1828 ई.) – 

  • 1805 ई. में महाराजा सूरतसिंह ने भटनेर दुर्ग पर अधिकार किया।
  • भटनेर का नाम हनुमानगढ़ रखा गया, क्योंकि यह विजय मंगलवार के दिन हुई थी।
  • 1814 ई. में चूरू दुर्ग पर आक्रमण किया गया।
  • इस युद्ध में शिवसिंह द्वारा चाँदी के गोले दागे गए।
  • चूरू का सामंत शिवसिंह था।
  • 21 मार्च 1818 ई. को अंग्रेजों से संधि की गई।
  • देशनोक स्थित करणी माता मंदिर को वर्तमान स्वरूप महाराजा सूरतसिंह ने प्रदान किया।

महाराजा रतनसिंह (1828–1851 ई.) – 

  • 1839 ई. में गया (बिहार) में कन्यावध पर रोक लगाई गई।
  • 1844 ई. में बीकानेर में कन्या-वध के विरुद्ध शपथ दिलाई गई।
  • सीकर के क्रांतिकारी जवाहरजी को आश्रय प्रदान किया।
  • महाराजा रतनसिंह को “माही मरातिव” की उपाधि प्राप्त हुई।
  • 1844 ई. में आंग्ल–अफगान तथा आंग्ल–सिख युद्धों में अंग्रेजों की सहायता की।
  • “रतन बिहारी मंदिर” का निर्माण करवाया।
  • इनके दरबारी विद्वान दयालदास थे, जिन्होंने “बीकानेर रा राठौड़ो री ख्यात” ग्रंथ की रचना की।

महाराजा सरदारसिंह (1851–1872 ई.) – 

  • 1857 की क्रांति में अंग्रेजों की सहायता हेतु एक मात्र शासक जो स्वयं सेना लेकर अपने राज्य से बाहर विद्रोह को दबाने के लिए गए।
  • 1868 ई. में सुजानगढ़ में अंग्रेजी एजेंसी की स्थापना की गई।

महाराजा डूंगरसिंह (1872–1887 ई.) – 

  • इनके समय बीकानेरी भुजिया का प्रारम्भ हुआ।
  • 1878 ई. में काबुल अभियान हेतु 800 ऊँटों की टुकड़ी भेजी गई।
  • 1884 ई. में डाकघर सेवा का प्रारम्भ किया गया।

महाराजा गंगासिंह (1867–1943 ई.) – 

  • महाराजा गंगासिंह डूंगरसिंह का छोटा भाई था।
  • 1900 ई. में चीन के बॉक्सर युद्ध में “गंगा रिसाला” भेजा गया।
  • उसे चीन युद्ध पदक प्राप्त हुआ।
  • 1913 ई. में प्रजा प्रतिनिधि सभा की स्थापना की गई।
  • प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की सहायता की।
  • 1919 ई. में पेरिस शांति सम्मेलन में भाग लिया।
  • वह चेम्बर ऑफ प्रिंसेस का प्रथम अध्यक्ष बना।
  • उसने तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया।
  • 1922–27 ई. के बीच गंगनहर का निर्माण करवाया।
  • गंगनहर का उद्घाटन लॉर्ड इरविन द्वारा किया गया।
  • उसका उपनाम “राजस्थान का भागीरथ” तथा “आधुनिक भारत का भागीरथ” था।
  • इस नहर के प्रमुख अभियंता कंवरसेन थे।
  • 1932 ई. में बीकानेर षड्यंत्र केस हुआ।
  • बी.एच.यू. को सर्वाधिक आर्थिक सहायता प्रदान की गई।
  • 22 जुलाई 1942 ई. को बीकानेर प्रजा परिषद्  की स्थापना हुई।

महाराजा शार्दुलसिंह (1943–1949 ई.) – 

  • महाराजा शार्दुलसिंह बीकानेर के राठौड़ों का अंतिम शासक था।
  • द्वितीय विश्व युद्ध के समय वह बर्मा तथा ईरान गया।
  • उसने ‘नोता’ तथा तख्तनशीनी की भेंट की प्रथा समाप्त की।
  • 7 अगस्त 1947 ई. को भारत संघ में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर किए।

किशनसिंह (स्थापना – 1609 ई.)

  • राजस्थान में राठौड़ वंश का तीसरा राज्य – किशनगढ़
  • स्थापना – 1609 ईस्वी
  • जोधपुर शासक मोटाराजा उदयसिंह का पुत्र
  • किशनसिंह द्वारा किशनगढ़ राज्य की स्थापना
  • बादशाह जहाँगीर द्वारा महाराजा की उपाधि प्रदान की गई

महाराजा सावंतसिंह (नागरीदास)

  • किशनगढ़ के प्रसिद्ध शासक
  • कृष्ण भक्ति में राजपाट त्यागकर वृंदावन चले गए
  • भक्ति नाम – नागरीदास
  • नागरीदास की प्रेयसी – बणी–ठणी
  • बणी–ठणी का मूल नाम – विष्णुप्रिया
  • बणी–ठणी का विश्व प्रसिद्ध चित्र – 
  • निहालचंद द्वारा निर्मित
  • बणी–ठणी को “भारत की मोनालिसा” कहा जाता है।
बीकानेर व किशनगढ़ के राठौड़

error: Content is protected !!
×
New RAS course according to updated syllabus
Visit youtube channel now
Scroll to Top
Telegram