सातवाहन वंश प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के इतिहास में मौर्य साम्राज्य के बाद दक्कन और मध्य भारत में सबसे प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा। उत्तरी क्षेत्र में जहाँ मौर्यों के उत्तराधिकारी शुंग और उसके बाद कण्व थे, वहीं लगभग 100 वर्षों के अंतराल के बाद सातवाहनों ने अपना शासन स्थापित किया। सातवाहन वंश के प्राचीन अभिलेख ईसा पूर्व पहली शताब्दी से मिलते हैं, जब इन्होंने कण्वों को हराकर मध्य भारत के कुछ हिस्सों पर अधिकार किया।
सातवाहन वंश

उत्तरी क्षेत्र में मौर्य साम्राज्य के सबसे महत्त्वपूर्ण उत्तराधिकारी शुंग थे और उसके बाद कण्व। दक्कन और मध्य भारत में, मौयों के बाद सातवाहन का शासन लगभग 100 वर्षों के अन्तराल के बाद आया। सातवाहन के प्राचीन अभिलेख ई.पू. पहली शताब्दी से सम्बन्धित हैं, जब उन्होंने कण्वों को हराकर मध्य भारत के कुछ हिस्सों में सत्ताएँ स्थापित कीं।
- वंश का संस्थापक – सिमुक था।
- सातवाहन वंश का शासन क्षेत्र – मुख्यतः महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक था।
- सातवाहन वंश की राजधानी – प्रतिष्ठान/पैठान थी
- राजकीय भाषा – ‘प्राकृत’ तथा लिपि – ‘ब्राम्ही’ थी।
- सातवाहन अभिलेख के आधार पर सिमुक को सातवाहन वंश का संस्थापक माना जाता है। इसने गोदावरी नदी के किनारे पैठन या प्रतिष्ठान को अपनी राजधानी बनाया।
स्त्रोत
- सातवाहन इतिहास को जानने के महत्त्वपूर्ण साधन – मत्स्य व वायु पुराण है। पुराणों में सातवाहनों को “आन्द्रभृव्य” तथा “आन्ध्रजातीय” कहा गया है।
नोट – पुराणों में इन्हें ‘आंध्रभृत्य’ कहा गया है तथा अभिलेखों में ‘सातवाहन’ कहा गया है।
- रानी नागनिका का नानाघाट अभिलेख (पुणे, महाराष्ट्र)
- गौतमीपुत्र शातकर्णी के नासिक से प्राप्त दो गुहालेख
- गौतमी बलश्री का नासिक गुहालेख
- वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी का नासिक गुहालेख
- वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी का कार्ले गुहालेख
- यज्ञश्री शातकर्णी का नासिक गुहालेख
नोट – पुराणों के अनुसार, आन्ध्रवासियों ने 300 वर्षों तक शासन किया था, हालाँकि यही अवधि सातवाहन वंश के शासन की भी मानी जाती है।
प्रमुख सातवाहन शासक
- सम्राट सिमुक
- कान्हा
- शातकर्णी प्रथम
- हाल
- सम्राट गौतमीपुत्र सातकर्णि
- वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी
- शिवश्री शातकर्णी
- शिवस्कंद शातकर्णी
- यज्ञश्री शातकर्णी
सिमुक (संस्थापक)
- प्रथम शताब्दी ई.पू. में वंश की स्थापना।
- जैन परंपरा अनुसार — बौद्ध व जैन मंदिरों का निर्माण कराया।
- अंतिम वर्षों में दुराचारी बन गया, मारा गया।
- प्रथम सातवाहन शासक का नाम “सिरी सातवाहन” भी मिला है।
- उत्तराधिकारी – कृष्ण, फिर शातकर्णी प्रथम।
शातकर्णी प्रथम
- नानाघाट और नागनिका अभिलेख से इसके बारे में जानकारी मिलती है।
- भूमिदान प्रथा की शुरुआत सर्वप्रथम सातवाहन शासकों ने शुरू की इसका प्रथम उल्लेख नागनिका के नानाघाट अभिलेख में आता है। (प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य – भूमिदान)
- यह सातवाहन वंश का पहला यशस्वी शासक था।
- शातकर्णी प्रथम ने दो अश्वमेध यज्ञ और एक राजसूय यज्ञ किया था।
- शातकर्णी प्रथम ने ‘दक्षिणापथपति’ तथा ‘अप्रतिहतचक्र’ की उपाधियां धारण कीं।
- शातकर्णी प्रथम ने मालव शैली की गोल मुद्राएं तथा अपनी पत्नी के नाम पर रजत मुद्राएं उत्कीर्ण करवाईं।
- उसके सिक्कों पर ‘श्रीसात’ (शातकर्णी का सूचक) का उल्लेख मिलता है।
हाल
- हाल एक बड़ा कवि तथा कवियों एवं विद्वानों का आश्रयदाता था।
- हाल ने ‘गाथासप्तशती’ [भाषा ‘प्राकृत] नामक एक मुक्तक काव्य की रचना की थी।
- उसकी राजसभा में ‘बृहत्कथा’ (पैशाची प्राकृत भाषा में रचित) के रचयिता गुणाढ्य तथा ‘कातंत्र’ नामक संस्कृत व्याकरण के लेखक सर्ववर्मन निवास करते थे।
- इसके शासनकाल में अमरावती स्तूप का विस्तार किया गया।
गौतमी पुत्र शातकर्णी (106-130 ई.)
- सातवाहन वंश का महानतम शासक था। इसने सातवाहन वंश को पुनर्जीवित किया।
- गौतमी पुत्र शातकर्णी को ’त्रि – समुद्र तोय – पिता वाहन‘ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है-उसके घोड़ों ने तीनों समुद्रों का पानी पिया था।
- उसकी विजय की जानकारी उसकी माता गौतमी बलश्री के नासिक अभिलेख से प्राप्त होती है। इस अभिलेख में उसे अद्वितीय ब्राम्हण (एकब्राम्हण) कहा गया है।
- गौतमीपुत्र शातकर्णी ने वेणकटक स्वामी की उपाधि धारण की तथा वेणकटक नामक नगर की स्थापना की। इसके अलावा उसने ‘राजाराज’ तथा ‘विंध्यनरेश’ की भी उपाधि धारण की।
- उसने बौद्ध संघ को ‘अजकालकिय’ तथा कार्ले के भिक्षुसंघ को ‘करजक’ नामक ग्राम दान में दिये।
- उसका साम्राज्य संभवतः उत्तर में मालवा से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक फैला हुआ था।
- गौतमीपुत्र शातकर्णी ने शक शासक नहपान को हराया था।
- नासिक (जोगलथंबी) से चांदी के लगभग 8 हजार सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनमें एक तरफ़ नहपान तथा दूसरी तरफ गौतमीपुत्र शातकर्णी का नाम है।
वाशिष्ठीपुत्र पुलमावि (130-154 ई.)
- गौतमी पुत्र शातकर्णी की मृत्यु के बाद शासक बना।
- अमरावती से प्राप्त लेख से इसके बारे में जानकारी मिलती है।
- आंध्र प्रदेश पर विजय के पश्चात् उसे प्रथम आंध्र सम्राट कहा गया।
- पुलुमावी ने अपनी राजधानी आंध्र प्रदेश के औरंगाबाद जिले में गोदावरी नदी के किनारे पैठान या प्रतिष्ठान बनाई।
- उसने शक शासक रूद्रदामन को दो बार पराजित किया। उसे ‘दक्षिणापथेश्वर’ भी कहा गया है। पुराणों में उसका नाम ‘पुलोमा’ मिलता है।
पुलुमावी के बाद शिवश्री शातकर्णी (154-165 ई0) तथा शिवस्कंदशातकर्णी (165-174 ई0) राजा हुए।
यज्ञश्री शातकर्णी (174-203 ई0)
- यज्ञश्री शातकर्णी सातवाहन वंश का अंतिम महत्वपूर्ण राजा था। उसने शकों के विजित क्षेत्र पर पुनः अधिकार कर लिया।
- यज्ञ श्री शातकर्णी व्यापार तथा समुद्री यात्रा का प्रेमी था। इसके सिक्कों पर जहाज, मत्स्य एवं शंख की आकृति उत्कीर्ण थी।
- उसके सिक्के आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश एवं गुजरात से प्राप्त हुए हैं।
- यज्ञश्री के मृत्यु के बाद सातवाहनों का साम्राज्य विभाजित हो गया, जिसका मुख्य कारण विद्रोह एवं केन्द्रीय शासन की दुर्बलता थी।
अन्तिम शासक
- पुलुमावी चतुर्थ – सातवाहन वंश का अन्तिम शासक।
सातवाहन कालीन समाज, संस्कृति व प्रशासन
समाज
- समाज चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) में विभक्त था, आधार – व्यवसाय।
- समाज में मातृसत्तात्मक तत्व विद्यमान थे, किंतु उत्तराधिकार पिता से पुत्र को मिलता था।
- नागानिका (शातकर्णी प्रथम की रानी) और गौतमी बलश्री (गौतमीपुत्र शातकर्णी की माता) ने प्रशासन में सक्रिय भूमिका निभाई।
- गौतमीपुत्र शातकर्णी को “आगमन निलय” (वेदों का आश्रय) व “अद्वितीय ब्राह्मण” कहा गया।
- उसने वर्णव्यवस्था को पुनर्स्थापित किया।
- समाज में वैष्णव, शैव और बौद्ध धर्म तीनों प्रचलित थे।
प्रशासन
- राजसत्ता की दैवी उत्पत्ति की अवधारणा प्रचलित थी। रानियाँ भी “देवी” या “महादेवी” उपाधि रखती थीं।
- सातवाहन प्रशासन मौर्य प्रशासन से प्रभावित था।
- राज्य को जिलों में बाँटा गया, जिन्हें ‘आहार’ कहा जाता था।
- प्रत्येक आहार पर एक अमात्य नियुक्त होता था।
- राजधानी में कार्यरत वरिष्ठ अधिकारी – राजमात्य।
- आहार के नीचे की इकाई – ग्राम, जिसका प्रमुख गौल्मिक (गौलिक) कहलाता था।
- हालिक भी ग्राम प्रशासनिक अधिकारी थे।
- कटक व स्कन्धावर – सैनिक शिविर, जो प्रशासनिक केंद्र के रूप में कार्यरत।
- सीमांत रक्षा अधिकारी – दुर्गाधिप।
- महा सेनापति – उच्च सैन्य पदाधिकारी।
- राजकीय प्रतीक – चैत्य।
- राजकीय भाषा – प्राकृत, लिपि – ब्राह्मी।
सामाजिक व प्रशासनिक श्रेणियाँ
- प्रथम श्रेणी – राजा
- द्वितीय श्रेणी – महाभोज
- तृतीय श्रेणी – सेनापति
अन्य प्रमुख अधिकारी –
- भाण्डगारिक – कोषाध्यक्ष
- रज्जुक – राजस्व विभाग प्रमुख
- पनियघरक – नगरों में जल आपूर्ति अधिकारी
- कर्मान्तिक – निर्माण कार्यों का निरीक्षक
भूमिदान व्यवस्था
- सातवाहनों ने भूमिदान की परंपरा प्रारंभ की।
- भूमिदान मुख्यतः ब्राह्मणों व बौद्ध भिक्षुओं को दिया जाता था।
- गौतमीपुत्र शातकर्णी का नासिक लेख – भूमिदान का प्रमुख अभिलेखीय साक्ष्य (शुल्कमुक्ति व विशेषाधिकार सहित)।
- नानाघाट अभिलेख – भूमिदान का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य।
- भूमिदान प्रथा से प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण और सामंतवाद की नींव पड़ी।
- भूमिकर – कुल उपज का 1/6 भाग।
सिक्का प्रणाली
- सातवाहनों ने सोने के सिक्के नहीं चलाए (सोना केवल मूल्यवान धातु के रूप में)।
- सिक्के – सीसे, ताँबे, काँसे और पोटीन (ताम्र+जिंक+सीसा+टिन) के।
- सिक्कों पर अंकित प्रतीक –
- राजशिर
- पाँच पत्तियों वाला चैत्य वृक्ष
- स्वास्तिक
- जहाज (समुद्री व्यापार का प्रतीक)
- शातकर्णी प्रथम – सर्वप्रथम राजा के नाम से सिक्के जारी करने वाला शासक।
- आवक्ष मुद्रा – बालगढ़ (छत्तीसगढ़) से प्राप्त।
- कार्षापण (काहापन) का प्रथम साक्ष्य – नानाघाट अभिलेख।
- रोमन सिक्कों की अधिकता – भारत-रोम व्यापार की पुष्टि।
- महारथी व महाभोज को अपने क्षेत्र में सिक्के जारी करने का अधिकार था।
व्यापार व अर्थव्यवस्था
- प्रमुख उत्पाद – कपास, धातुएँ, मोती, मसाले।
- प्रमुख बंदरगाह व नगर –
भदौंच (भड़ौच), सोपारा, पैठान, तगर (तेर), धान्यकटक, अमरावती, नागार्जुनकोंडा, अरिकमेडु, कावेरीपट्टनम। - कार्ले अभिलेख – ‘कारूकर’ शब्द से कारीगरों पर लगने वाले कर का उल्लेख।
- व्यापारियों व शिल्पियों में महायान बौद्ध धर्म लोकप्रिय।
धर्म, संस्कृति व स्थापत्य
- राज्य का प्रमुख प्रतीक – चैत्य।
- मुख्य बौद्ध स्मारक –
- कार्ले का चैत्य
- अमरावती का स्तूप – निर्माण 200 ई.पू. से; खोज – मैकेन्जी (1797 ई.)
- नागार्जुनकोंडा – सातवाहन व उत्तरवर्ती इक्ष्वाकु कालीन बौद्ध केंद्र।
- अमरावती व नागार्जुनकोंडा – सातवाहनों के काल में बौद्ध संस्कृति के महत्त्वपूर्ण केंद्र।
