राजस्थान के इतिहास के पुरातात्त्विक स्रोत प्राचीन सभ्यताओं, राजवंशों और सांस्कृतिक विकास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। राजस्थान के इतिहास विषय का अध्ययन करते समय पुरातात्त्विक साक्ष्य हमें उस काल के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन की वास्तविक झलक प्रदान करते हैं। ये स्रोत इतिहास की विश्वसनीयता को प्रमाणिक आधार प्रदान करते हैं और अतीत को वैज्ञानिक ढंग से समझने में सहायता करते हैं।
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राजस्थान के इतिहास के पुरातात्त्विक स्रोत
परिभाषा : – ऐतिहासिक स्रोत वे सामग्री, दस्तावेज़, वस्तुएँ और अभिलेख हैं जिनका उपयोग इतिहासकार अतीत की घटनाओं, जीवन, संस्कृति और समाज को समझने के लिए करते हैं। ये स्रोत अतीत के प्रमाण (Evidence) होते हैं और किसी विशेष समय, स्थान या घटना के बारे में प्रामाणिक जानकारी प्रदान करते हैं।


शिलालेख

- परिभाषा : – वे लेख जो पत्थर, धातु, लकड़ी, मिट्टी या अन्य ठोस सतहों पर खुदे या अंकित किए जाते हैं, उन्हें शिलालेख कहा जाता है।
- मुख्य विशेषताएँ : –
- स्थायी रूप से अंकित रहते हैं, मिटाए नहीं जा सकते।
- समय के साथ नष्ट नहीं होते, इसलिए प्रमाणिक साक्ष्य हैं।
- तिथि, नाम, स्थान और घटना का प्रामाणिक विवरण देते हैं।
- प्रमुख विषय-वस्तु : –
- राजा-महाराजाओं के आदेश, फरमान और घोषणाएँ।
- शासन व्यवस्था एवं प्रशासनिक जानकारी।
- युद्धों, विजयों, धार्मिक अनुष्ठानों और मंदिर निर्माण का विवरण।
- दान-पुण्य, यज्ञ, सामाजिक कार्यों का उल्लेख।
- उपयोगिता : –
- जनता तक सूचना पहुँचाने का प्रमुख माध्यम।
- इतिहासकारों के लिए प्रामाणिक स्रोत — राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक जानकारी का आधार।
- राजस्थान के इतिहास में राजवंशों की कालक्रमिक जानकारी प्रदान करते हैं।
अभिलेख

- परिभाषा : – वे लिखित दस्तावेज जो शासन, धर्म या समाज से जुड़ी घटनाओं और आदेशों को रिकॉर्ड के रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं, उन्हें अभिलेख कहा जाता है।
- माध्यम : – ताड़पत्र, भोजपत्र, कागज़, कांस्य अथवा ताम्रपत्र आदि पर लिखे जाते थे।
- प्रमुख विषय-वस्तु : –
- प्रशासनिक आदेश, करारनामे, नीतियाँ और अनुदान।
- दानपत्र, भूमि-दान, धार्मिक व सामाजिक कार्यों के विवरण।
- ऐतिहासिक घटनाओं और शासकों की गतिविधियों का लेखा-जोखा।
- उपयोगिता : –
- प्राचीन समाज की प्रशासनिक और आर्थिक व्यवस्था समझने में सहायक।
- राजनीतिक, धार्मिक व सांस्कृतिक इतिहास का महत्त्वपूर्ण स्रोत।
- इतिहासकारों के लिए प्रामाणिक प्रमाण-पत्र ।
राजस्थान के प्रमुख शिलालेख और अभिलेख
नगरी शिलालेख (दूसरी शताब्दी ई.पूर्व) –
- स्थान: चित्तौड़, नगरी
- भाषा/लिपि: संस्कृत, ब्राह्मी लिपि
- महत्त्व: घोसुण्डी शिलालेख का जुड़वा अभिलेख
अपराजित शिलालेख (661 ई.) –
- स्थान: उदयपुर, कुंडेश्वर मंदिर
- विवरण: 7वीं शताब्दी के मेवाड़ के शासक अपराजित का उल्लेख
ग्वालियर प्रशस्ति –
- शासक: गुर्जर प्रतिहार मिहिर भोज
- महत्त्व: राजस्थान के प्रतिहार इतिहास से संबंधित
कणसवा शिलालेख (738 ई.) –
- स्थान: कोटा, कणसवा गाँव, शिवालय
- महत्त्व: राजस्थान और मौर्य शासकों के संबंध का प्रमाण
मानमोरी शिलालेख (8वीं शताब्दी) –
- स्थान: चित्तौड़, मानसरोवर झील के पास
- विवरण: भीम को अवन्तिपुर का राजा बताया गया
हर्षनाथ प्रशस्ति (973 ई.) –
- स्थान: सीकर, हर्षनाथ मंदिर
- विवरण: चौहान शासक अल्लट और वागड़ का वर्णन (वार्गट)
आर्थूणा शिव मंदिर प्रशस्ति (1079 ई.) –
- स्थान: बांसवाड़ा, आर्थूणा गाँव, शिवालय
- विवरण: वागड़ के परमार शासकों का वर्णन
किराडू शिलालेख (1161 ई.) –
- स्थान: बाड़मेर, किराडू शिव मंदिर
- विवरण: परमारों की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के आबू यज्ञ से मानी गई
सच्चिका माता मंदिर प्रशस्ति (1179 ई.) –
- स्थान: जोधपुर, ओसिया
- विवरण: मांडव्यपुर के शासक कीर्तिपाल और कल्हण का उल्लेख
नेमिनाथ (आबू) मंदिर प्रशस्ति (1230 ई.) –
- स्थान: माउंट आबू, नेमिनाथ मंदिर
- लेखक: तेजपाल
- विवरण: परमार शासकों का विवरण
चीरवा शिलालेख (1273 ई.) –
- स्थान: उदयपुर, चीरवा गाँव
- विवरण: गुहिल वंश के शासक बप्पा रावल और सती प्रथा का उल्लेख
जैन कीर्ति स्तम्भ अभिलेख (13वीं शताब्दी) –
- स्थान: चित्तौड़, जैन कीर्ति स्तम्भ
- विवरण: तीन शिलालेख, जैन शासकों का विवरण; स्थापना: जीजा (जीजाक)।
श्रृंगी ऋषि का लेख (1428 ई.) –
- स्थान: उदयपुर, एकलिंगजी के पास
- विवरण: गुहिल वंश के शासकों की जानकारी
देलवाड़ा शिलालेख (1439 ई.) –
- विवरण: “टंक” नामक मुद्रा का उल्लेख; आर्थिक स्थिति का प्रमाण
रणकपुर प्रशस्ति (1439 ई.) –
- स्थान: पाली, रणकपुर, चौमुखा मंदिर
- विवरण: बप्पा रावल से कुंभा तक के शासकों का वर्णन
कुंभलगढ़ अभिलेख (1460 ई.) –
- स्थान: कुंभलगढ़, कुंभश्याम मंदिर
- विवरण: बप्पा रावल का ब्राह्मण वंश से संबंध
रायसिंह प्रशस्ति (1594 ई.) –
- स्थान: बीकानेर दुर्ग
- विवरण: रायसिंह के विजयों और राठौड़ शासकों का विवरण
जगन्नाथ राय प्रशस्ति (1652 ई.) –
- स्थान: उदयपुर, जगन्नाथ मंदिर
- विवरण: मेवाड़ के शासक और हल्दीघाटी युद्ध का वर्णन
राज प्रशस्ति (1676 ई.) –
- स्थान: राजसमंद झील की पाल
- विवरण: मेवाड़ के सिसोदिया वंश और घेवर माता मंदिर का उल्लेख; विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख
वैद्यनाथ मंदिर प्रशस्ति (1719 ई.) –
- स्थान: उदयपुर, सीसारमा गाँव, वैद्यनाथ मंदिर
- विवरण: बप्पा रावल से संग्रामसिंह द्वितीय तक के शासकों का विवरण
पालिताणा का शिलालेख –
- स्थान: गुजरात
- विवरण: जैन और राजपूत समाज के सांस्कृतिक संबंधों का प्रमाण
राजस्थान के प्रमुख शिलालेख एक नजर में
| शिलालेख का नाम | स्थान | तिथि/काल | महत्त्व (मुख्य बिंदु) |
| घोसुण्डी | चित्तौड़ | 200-150 ई.पूर्व | सबसे प्राचीन वैष्णव/भागवत सम्प्रदाय का प्रमाणविष्णु मंदिर व अश्वमेध यज्ञ का उल्लेखब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा में लिखा गया |
| नगरी | चित्तौड़ | दूसरी शताब्दी ई.पूर्व | घोसुण्डी शिलालेख का जुड़वा अभिलेखवैष्णव सम्प्रदाय का विस्तारब्राह्मी लिपि और संस्कृत में लिखा गया |
| बैराठ | जयपुर | मौर्य काल | मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल से संबंधितमौर्य साम्राज्य का राजस्थान में प्रभाव दर्शाता हैप्राचीन प्रशासनिक व्यवस्था का प्रमाण |
| भ्रमर माता | छोटी सादड़ी | 490 ई. | गौरवंश और औलिकर वंश की जानकारीमंदिर और वंशावलियों का संवेदनशील विवरणक्षेत्रीय राजनीतिक इतिहास का साक्ष्य |
| गोठ मांगलोद | नागौर | 608 ई. | दाहिमा क्षेत्र से सम्बंधितदधिमती माता मंदिर में उत्कीर्णक्षेत्रीय प्रशासन और संस्कृति की जानकारी |
| घटियाला | जोधपुर | 861 ई. | हरिश्चन्द्र, कक्कुक, तथा प्रतिहार वंश का उल्लेखमण्डोर के प्रतिहारों की वंशावली के प्रमाणसती प्रथा के प्राचीनतम प्रमाणों में से एक |
| बिजौलिया | भीलवाड़ा | 1170 ई. | चौहान वंश से संबंधितसांभर झील के निर्माण का प्रमाणजैन श्रावक लोलाक द्वारा उत्कीर्ण |
| नाथ प्रशस्ति | एकलिंगजी (उदयपुर) | 971 ई. | बापा रावल और गुहिल शासकों का वर्णनलकुलीश मंदिर में स्थितमेवाड़ के धार्मिक और राजनीतिक इतिहास का साक्ष्य |
| कीर्ति स्तंभ | चित्तौड़गढ़ | 1460 ई. | महाराणा कुंभा की उपलब्धियाँमेवाड़ के चार भागों का विवरण स्थापत्य व सामाजिक इतिहास में महत्त्वपूर्ण शिलालेख |
| आमेर | जयपुर | 1612 ई. | कच्छवाहा राजवंश का इतिहासमानसिंह द्वारा जमुवारामगढ़ के निर्माण का उल्लेखशासकों के विजयों का वर्णन |
ताम्र – पत्र
- परिभाषा : –
- ताम्रपत्र प्राचीन दस्तावेज़ या अभिलेख होते थे, जिन्हें ताँबे की पतली चादरों पर लिखा जाता था।
- इनका प्रयोग मुख्यतः शाही घोषणाएँ, आदेश, भू-दान, धार्मिक व सामाजिक नियमों को दर्ज करने के लिए किया जाता था।
- ये अभिलेखीय साक्ष्य (Documentary Evidence) के रूप में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं।
- भाषा और लिपि : –
- भाषाएँ: मुख्य रूप संस्कृत और प्राकृत।
- लिपि: प्रायः ब्राह्मी लिपि में लेखन किया जाता था।
- प्रमुख विशेषताएँ : –
- अक्षर खुदाई (engraving) द्वारा अंकित किए जाते थे — मिटते नहीं थे।
- दीर्घकाल तक सुरक्षित रहने वाले टिकाऊ अभिलेख।
- दस्तावेज़ों को कड़ी से जोड़कर रखा जाता था (जैसे पट्टिकाओं का बंडल)।
- प्राचीन शासन और धर्म से संबंधित आदेशों के विश्वसनीय प्रमाण।
- ऐतिहासिक महत्त्व : –
- राजनीतिक इतिहास का स्रोत – शासकों के शासनकाल, वंश और नीति संबंधी जानकारी।
- धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था की जानकारी – अनुदान, मंदिरों और ब्राह्मणों को भूमि दान का विवरण।
- प्रशासनिक और आर्थिक जीवन का दस्तावेज़ – कर व्यवस्था, भूमि मापन और अधिकारों का उल्लेख।
- सांस्कृतिक जीवन का प्रतिबिंब – धर्म, शिक्षा और लोकसंस्कृति से संबंधित साक्ष्य।
राजस्थान के प्रमुख ताम्र – पत्र
धुलेव का दान पत्र (679 ई.) –
- दाता: राजा भेटी
- प्राप्तकर्त्ता : भट्टीनाग ब्राह्मण
- दान: उब्बरक गाँव
- विशेष उल्लेख: आश्वा भुज संवत् का उल्लेख
- महत्त्व: राजस्थान का सबसे प्राचीन ताम्रपत्र; धार्मिक अनुदान और संवत् प्रणाली का प्रमाण
मथनदेव का ताम्रपत्र (959 ई.) –
- दाता / शासक: मथनदेव
- प्रमुख उल्लेख: मंदिर हेतु भूमि दान; ग्राम के गणमान्य और राजपुरुष उपस्थित
- महत्त्व: सामंती समाज में धार्मिक कार्यों हेतु भूमि दान की प्रथा का प्रमाण
ब्रोंच गुर्जर ताम्रपत्र (978 ई.) –
- प्रमुख उल्लेख: गुर्जर वंश के भारत-विस्तार का वर्णन
- महत्त्व: गुर्जर वंश के विस्तार और राजपूत उत्पत्ति पर ऐतिहासिक बहस का स्रोत
वीरपुर दान पत्र (1185 ई.) –
- प्रमुख उल्लेख: गुजरात के चालुक्य शासकों से संबंधित जानकारी मिलती है।
- महत्त्व: राजनीतिक संघर्ष और शक्ति-संतुलन का प्रमाण
आहड़ ताम्रपत्र (1206 ई.) –
- शासक: गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव
- प्रमुख उल्लेख: सोलंकी राजाओं की वंशावली
- महत्त्व: राजस्थान-गुजरात राजनीतिक संबंध और सोलंकी राजवंश का प्रमाण
खेरड़ा ताम्रपत्र (1437 ई.) –
- शासक: महाराणा कुंभा
- प्रमुख उल्लेख: 400 टके का धार्मिक दान
- महत्त्व: धार्मिक कार्यों और आर्थिक दान का प्रमाण
पारसोली ताम्रपत्र (1473 ई.) –
- प्रमुख उल्लेख: भूमि की विभिन्न किस्में – पीवाल, गोरमो, माल, मगरा
- महत्त्व: कृषि भूमि के प्रकार और प्रणाली की जानकारी
चीकली ताम्रपत्र (1483 ई.) –
- प्रमुख उल्लेख: किसानों से वसूले जाने वाले कर; पटेल, सुथार और ब्राह्मण जातियों का उल्लेख
- महत्त्व: कर व्यवस्था और सामाजिक संरचना का स्रोत
पुर ताम्रपत्र (1535 ई.) –
- शासक: महाराणा विक्रमादित्य (चित्तौड़)
- प्रमुख उल्लेख: जौहर प्रथा और चित्तौड़ के दूसरे साके का विवरण
- महत्त्व: मेवाड़ की वीरता, सामाजिक-धार्मिक परंपराओं का ऐतिहासिक प्रमाण
ढोल ताम्रपत्र (1574 ई.) –
- शासक: महाराणा प्रताप
- प्रमुख उल्लेख: ढोल गाँव की सैन्य चौकी के लिए भूमि अनुदान
- महत्त्व: प्रतापकालीन प्रशासनिक व सैन्य व्यवस्था का प्रमाण
पीपली ताम्रपत्र (1576 ई.) –
- शासक: महाराणा प्रताप
- प्रमुख उल्लेख: हल्दीघाटी युद्ध के बाद पुनर्वास और सहायता कार्य
- महत्त्व: सामाजिक-आर्थिक पुनर्निर्माण की नीतियों का प्रमाण
बेडवास ताम्रपत्र (संवत् 1616 / 1559 ई.) –
- प्रमुख उल्लेख: उदयपुर बसाने का प्रथम संदर्भ
- महत्त्व: मेवाड़ की नई राजधानी उदयपुर स्थापना से संबंधित
रंगीली ग्राम ताम्रपत्र (1656 ई.)
- प्रमुख उल्लेख: गंधर्व मोहन को गाँव का करमुक्त अनुदान
- महत्त्व: ग्रामीण अनुदान और करमुक्ति नीति का उदाहरण
लावा ग्राम ताम्रपत्र –
- विशेषता: सामाजिक विवाह प्रथा का विवरण; लड़कियों के विवाह संबंधी अधिकार
- महत्त्व: सामाजिक रीति-नीति और स्त्रियों की स्थिति का प्रमाण
डीगरोल ताम्रपत्र –
- शासक: महाराणा जगतसिंह
- प्रमुख उल्लेख: गाँव प्रशासन का विवरण
- महत्त्व: ग्राम प्रशासन और स्थानीय शासन का स्रोत
ग्राम गड़बोड़ ताम्रपत्र –
- प्रमुख उल्लेख: मंदिरों की व्यवस्था और सामाजिक गतिविधियाँ
- महत्त्व: धार्मिक संस्थानों और सामाजिक जीवन की जानकारी
प्रतापगढ़ ताम्रपत्र –
- प्रमुख उल्लेख: ब्राह्मणों पर लगे कर को हटाने का उल्लेख
- महत्त्व: कर प्रणाली और ब्राह्मण वर्ग की स्थिति का प्रमाण
कीटखेड़ी ताम्रपत्र (1650 ई.) –
- प्रमुख उल्लेख: गोवर्धननाथजी मंदिर के लिए भूमि दान
- महत्त्व: धार्मिक प्रतिष्ठा और भूमि दान की प्रथा
पारणपुर दान पत्र (1676 ई.) –
- शासक: प्रतापसिंह
- प्रमुख उल्लेख: धार्मिक शिक्षा और प्रशासनिक वर्ग का विवरण
- महत्त्व: प्रशासनिक और धार्मिक व्यवस्था का स्रोत
मुद्रा/ सिक्के
- परिभाषा और अध्ययन –
- सिक्कों का अध्ययन न्यूमिस्मेटिक्स (Numismatics) कहलाता है।
- सिक्के केवल आर्थिक लेन-देन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन के प्रमाण भी हैं।
- भारतीय इतिहास में सिक्के शासकों की नीति, धार्मिक विश्वास और प्रशासनिक पहचान प्रकट करते हैं।
- प्रारंभिक सिक्के – आहत सिक्के (Punched Coins)
- प्राचीन भारत के प्रथम सिक्के – आहत सिक्के या पंचमार्क सिक्के।
- इन पर विशेष चिन्हों (Punch Marks) को ठोककर अंकित किया जाता था।
- सर्वप्रथम ऐसे सिक्कों के साक्ष्य राजस्थान में मिले।
- प्रायः चांदी की धातु से बनाए जाते थे।
- कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इन्हें “पण” या “कार्षापण” कहा गया है।
- आकार – वर्गाकार, आयताकार या वृत्ताकार।
- भारतीय सिक्कों का ऐतिहासिक विकास –
- कुषाण काल (1st–3rd शताब्दी ई.)
- सोने के सिक्कों का सर्वप्रथम प्रचलन कुषाण शासक विमकडफिसस ने किया।
- सिक्कों पर शासक की छवि एवं यूनानी-भारतीय प्रतीक अंकित होते थे।
- यह काल भारतीय सिक्का प्रणाली के स्वर्ण युग का आरंभ माना जाता है।
- कुषाण काल (1st–3rd शताब्दी ई.)
- गुप्त काल (4th–6th शताब्दी ई.)
- सोने के सिक्कों का स्वर्ण युग।
- प्रमुख सिक्का – “दीनार” (Gold Coin)।
- अधिकांश सिक्के भरतपुर के बयाना से प्राप्त हुए।
- सिक्कों पर सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक प्रतीक अंकित होते थे — जैसे लक्ष्मी, गरुड़, अश्वमेध यज्ञ आदि।
- राजपूत काल (8th–12th शताब्दी ई.)
- राजस्थान की रियासतों में सिक्कों का विशेष स्थान।
- सिक्कों पर शासकों की छवि, धार्मिक प्रतीक और राजचिह्न अंकित।
- सिक्के रियासतों की धार्मिक आस्था, संस्कृति और शासन की पहचान दर्शाते थे।
राजस्थान की प्रमुख रियासतों के सिक्के
जयपुर रियासत –
- टकसाल का चिह्न: छ: शाखाओं वाला झाड़
- सिक्के: झाड़शाही सिक्के
- स्थापना: 1728 ई. में सवाई जयसिंह द्वितीय
- प्रमुख सिक्के: रसकपूर, हाली, मुहम्मदशाही
जोधपुर रियासत –
- सिक्के: विजयशाही (महाराजा विजयसिंह)
- अन्य सिक्के: पंचमार्क, गजशाही, लल्लूलिया रूपया, तख्तसिंह
- सोने के सिक्के: मोहर
मेवाड़ रियासत –
- मुगलों के एलची सिक्के
- प्रमुख सिक्के: रूपक, तांबे के ढींगला, कर्षापण, नाथद्वारिया
- सलूम्बर में पदमशाही सिक्का (तांबे का)
चाहमाना (चौहान) रियासत –
- 1192 ई. का सिक्का: श्री मुहम्मद सैम” और पृथ्वीराज चौहान का नाम
- सिक्के: द्रम्प, विशोपक, रूपक, दीनार
धौलपुर रियासत –
- सिक्कों की ढलाई: 1804 ई. से
- सिक्के: तमंचा शाही (तमंचे का चिह्न)
अन्य रियासतें –
- बीकानेर: गजशाही (चांदी का सिक्का)
- कोटा: मदनशाही, गुमानशाही
- बूंदी: ग्यारहसना, रामशाही
- प्रतापगढ़: आलमशाही, नया सालिमशाही
- जैसलमेर: अखेशाही, डोडिया
राजस्थान की प्रमुख रियासतों के सिक्के एक नजर में
| रियासत | सिक्कों के प्रकार |
| मेवाड़ | ढिंगाल 4. चित्तौड़ी भिलाड़ी 5. एलची (मुगली सिक्का)चांदौडी |
| जोधपुर | लल्लूलिया 3. गजशाहीविजयशाही 4. भीमशाही |
| जयपुर | हाली 3. मुहम्मदशाहीझाड़शाही |
| जैसलमेर | अखैशाही 2. डोडिया |
| डूंगरपुर | उदयशाही 3. पत्रीसीरियात्रिशुलिया |
| बूंदी | कटारशाही 3. पुराना रूपयाचेहरेशाही 4. ग्यारह-साना |
| धौलपुर | तमंचाशाही |
| अलवर | तांबा रावशाही टक्काअंग्रेजी पाव आना सिक्का |
| कोटा | गुमानशाही 2. मदनशाही |
| करौली | माणकशाही |
| सिरोही | चाँदी भिलाड़ी 2. ताम्र ढ़ब्बूशाही |
सिक्कों से संबंधित अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य
- विलियम बिलफेड (1893): पुस्तक THE CURRENCY OF THE HINDU STATE OF RAJPUTANA
- सर्वप्रथम लेख वाले सिक्के: विराटनगर (कोटपूतली-बहरोड़),मौर्यकालीन
- गधिया सिक्के: करौली रियासत; हूण शासकों द्वारा मेवाड़ और मारवाड़ में प्रचलित
- टोंक जिले में ए.सी.एल. कार्लाइल ने लगभग 6000 तांबे के सिक्के पाए
- रैढ़ (टोंक): 3075 चांदी की आहत मुद्राएँ; भारत में एक ही स्थान से सबसे बड़ा भंडार
- मारवाड़ में प्रचलित आदिवराह शैली: गुर्जर प्रतिहार राजवंश से संबंधित
- कुचामन टकसाल: इक्तीसंदा रुपया
- बैराठ (जयपुर): 36 मुद्राएँ (8 आहत, 28 इण्डो-ग्रीक)
- रंगमहल (हनुमानगढ़): 105 तांबे के सिक्के; एक सिक्का कुषाण शासक कनिष्क का
- बीकानेर: सिक्कों पर महारानी विक्टोरिया और राजा का नाम नागरी लिपि में
- अकबर: मेवाड़ में ‘सिक्का-ए-एलची’ जारी
- आहड़: 6 तांबे के सिक्कों पर यूनानी देवता अपोलो का चित्र
- भरतपुर (बयाना): गुप्तकालीन सोने के सिक्कों का ढेर (~1800 सिक्के), अधिकतर चन्द्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’
- टोंक (रैढ़): गुप्तकालीन 6 स्वर्ण मुद्राएँ, 4 चन्द्रगुप्त द्वितीय की
- नलियासर (साँभर): गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम की चांदी की मुद्राएँ, मयूर आकृति उत्कीर्ण
