मारवाड़ का राठौड़ राजवंश राजस्थान का इतिहास में एक प्रमुख और वीर राजवंश माना जाता है, जिसने पश्चिमी राजस्थान में अपनी सशक्त राजनीतिक एवं सांस्कृतिक पहचान स्थापित की। इस वंश के शासकों ने मारवाड़ क्षेत्र को संगठित कर शक्तिशाली राज्य के रूप में विकसित किया और राजपूत गौरव, शौर्य तथा प्रशासनिक कुशलता की मिसाल प्रस्तुत की।

मारवाड़ का राठौड़ राजवंश
कुलदेवी एवं आराध्य देवी –
- नागणेची माता राठौड़ों की कुलदेवी मानी जाती हैं।
- चामुंडा माता राठौड़ों की आराध्य देवी मानी जाती हैं।
राठौड़ शब्द की उत्पत्ति
- ‘राठौड़’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द ‘राष्ट्रकूट’ से मानी जाती है।
राठौड़ों की उत्पत्ति संबंधी विभिन्न मत –
- भाटियों की पोथियों के अनुसार राठौड़ हिरण्यकश्यप की संतान माने जाते हैं।
- दयालदास री ख्यात के अनुसार राठौड़ सूर्यवंशी एवं ब्राह्मणवंशी भल्लराव की संतान थे और कन्नौज से आए थे।
- यह मत नैणसी की ख्यात एवं पृथ्वीराज रासो में भी मिलता है।
- जोधपुर री ख्यात के अनुसार राठौड़ राजा विश्वुतमान के पुत्र राजा वृहदबल से उत्पन्न हुए थे।
- कर्नल टॉड के अनुसार राठौड़ कन्नौज के जयचन्द गहड़वाल की संतान थे।
- विश्वेश्वरनाथ रेऊ के अनुसार राठौड़ जयचन्द के वंशज थे।
- डॉ. जी.एच. ओझा के अनुसार राठौड़ बदायूँ के राठौड़ों के वंशज थे तथा उनका संबंध दक्षिण भारत के राष्ट्रकूटों से भी था।
- राजस्थान में राठौड़ों का शासन हस्तिकुण्डी, धनोप, वागड़, जोधपुर एवं बीकानेर में रहा तथा जोधपुर और बीकानेर शाखा अधिक प्रसिद्ध हुई।
जयचन्द, हरिश्चन्द्र एवं सेतराय
- जयचन्द चन्दावर के युद्ध में मुहम्मद गौरी से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
- हरिश्चन्द्र जयचन्द के बाद कन्नौज की गद्दी पर बैठा।
- 1226 ई. में इल्तुतमिश के आक्रमण के बाद हरिश्चन्द्र महुई चला गया।
- सेतराय, हरिश्चन्द्र का छोटा पुत्र था।
राव सीहा : राठौड़ वंश का संस्थापक
- राव सीहा को राठौड़ वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
- राव सीहा ने खेड़–महुली (फर्रुखाबाद) में काली नदी के तट पर एक दुर्ग का निर्माण करवाया।
- फर्रुखाबाद पर मुस्लिम अधिकार होने पर राव सीहा द्वारिका की ओर चला गया।
- ब्राह्मणों के आग्रह पर पुष्कर के पड़ाव पर भीनमाल को मुस्लिम आक्रमणकारियों से बचाया।
- पालीवाल ब्राह्मणों की याचना पर पाली को भीलों, मीणों और मेरों से बचाकर पाली को अपना केन्द्र बनाया।
- बीठू गाँव (पाली) लेख 1273 ई. के अनुसार राव सीहा ने लाख झंवर / धौला चौतरा युद्ध में सिंध के मुस्लिम लुटेरों से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।
- राव सीहा व्यवस्थित साम्राज्य की स्थापना नहीं कर पाया।
राव आस्थान (1273–1291 ई.) –
- राव आस्थान ने पाली के स्थान पर गुन्दोच गाँव को शक्ति का केन्द्र बनाया।
- उसने खेड़ और ईडर पर भी अधिकार किया।
- 1291 ई. में जलालुद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय राव आस्थान युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ।
राव धूहड़ (1291–1309 ई.)
- राव धूहड़ ने प्रतिहारों को पराजित कर मण्डोर पर अधिकार किया।
- 1309 ई. में प्रतिहारों से संघर्ष करते हुए वीरगति प्राप्त की।
- नागणेची माता (चक्रेश्वरी) की मूर्ति कर्नाटक से लाकर नागणा गाँव (बालोतरा) में स्थापित करवाई।
रायमल, भीम, रायकनकपाल एवं जालणसी
- रायमल ने मण्डोर पर पुनः अधिकार किया परंतु भाटियों व तुर्कों से संघर्ष करते हुए वीरगति प्राप्त की।
- भीम भाटियों के साथ संघर्ष में मारा गया।
- रायकनकपाल भाटियों के साथ संघर्ष में मारा गया।
- जालणसी भाटियों के साथ संघर्ष में मारा गया।
राव छाड़ा –
- राव छाड़ा एक शक्तिशाली शासक था।
- इसने उमरकोट के सोढ़ों, जैसलमेर, जालौर, नागौर, सोजत और भीनमाल के शासकों को पराजित किया।
- 1344 ई. में सोनगरा तथा देवड़ा चौहानों से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
राव तीड़ा
- राव तीड़ा ने सोनगरा चौहान, देवड़ा, भाटी, बालेचा चौहान तथा सोलंकियों को पराजित किया।
- तुर्की सेना से सिवाणा की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की।
मल्लीनाथ
- मल्लीनाथ ने तुर्कों से ‘महेवा’ छीनकर उस पर राठौड़ आधिपत्य स्थापित किया।
- मल्लीनाथ ने ‘रावल’ की उपाधि धारण की।
- माता – जाणीदे, पिता – रावल सलरखा।
- जन्म – 1358 ई.
- 1378 ई. में मालवा सूबेदार निजामुद्दीन की सेना को पराजित किया।
- 1389 ई. में उगमसी भाटी के शिष्य बने और योग साधना की दीक्षा ली।
- 1399 ई. में विराट हरि कीर्तन का आयोजन किया।
- मृत्यु चैत्र शुक्ल द्वितीया को हुई।
- तिलवाड़ा (बालोतरा) में मल्लीनाथ का मंदिर स्थित है।
- पश्चिमी जोधपुर परगने का नाम मालानी इन्हीं के नाम पर पड़ा।
राव चूण्डा (1394–1423 ई.) –
- राव चूण्डा का पालन-पोषण चाचा मल्लीनाथ ने किया।
- सालौड़ी गाँव की जागीर प्राप्त हुई।
- शाखा के प्रतिहार राजा ने मण्डोर दहेज में दिया।
- मण्डोर को राजधानी बनाया।
- खाटू, डीडवाना, सांभर, अजमेर और नाडोल पर अधिकार किया।
- 1423 ई. में पुंगल के भाटियों द्वारा धोखे से मारा गया।
- चूँड़सर तालाब नागौर में बनवाया।
- पत्नी चांद दे ने चांद बावड़ी जोधपुर में बनवाई।
- बड़े पुत्र रणमल के स्थान पर छोटे पुत्र कान्हा को उत्तराधिकारी बनाया।
कान्हा –
रणमल (1427–38 ई.)
- कान्हा के शासक बनने से नाराज होकर मेवाड़ चला गया।
- हंसा बाई (बहन) का विवाह मेवाड़ में किया।
- भांजे मोकल के महाराणा बनने पर मेवाड़ प्रशासन पर अत्यधिक प्रभाव
- कान्हा के पुत्र सता के समय सता के भाई रणधीर ने रणमल को मारवाड़ आमंत्रित किया।
- 1438 ई. में कुंभा (मेवाड़ी सामन्तों) द्वारा भारमली (प्रेमिका) से जहर दिलवाकर मरवा दिया।
राव जोधा (1438–89 ई.)
- रणमल व कोडमदे के पुत्र
- राव जोधा की माता कोडमदे ने कोडमदेसर बावड़ी (बीकानेर) बनवाई।
- प. राजस्थान की प्राचीनतम बावड़ी
- 1453 ई. मण्डौर पर अधिकार किया
राणा कुंभा के साथ
- आवल–बावल की संधि
- राठौड़–सिसोदिया संधि
- मेवाड़–मारवाड़ (खेजड़ी) संधि – 1453 ई.
- रायमल (कुंभा पुत्र) × शृंगार दे (जोधा की पुत्री) विवाह
- संधि का केन्द्र – सोजत (पाली)
- 1459 ई. जोधपुर नगर बसाया, राजधानी बनाई
- जोधा की पत्नी जसमा दे ने राणीसर तालाब का निर्माण करवाया
- दिल्ली सुल्तान बहलोल लोदी की सेना को परास्त किया।
- मेहरानगढ दुर्ग का निर्माण करवाया।
- मेहरानगढ दुर्ग का अर्थ – विशालकाय,
- लाल बलुभा पत्थर से निर्मित
- (गिरि दुर्ग) का निर्माता – राव जोधा
- (करणीमाता ने नींव रखी)
- उपनाम
- मयूरध्वज
- गढ़चिंतामणि
- चिड़ियाटूक पहाड़ी
- इसके 2 बाह्य दरवाजे
- जयपोल
- फतेह पोल
- 1544 ई. में शेरशाह सूरी ने इस पर अधिकार किया।
- अकबर के समय यहां हुसैन कुली बेग का अधिकार रहा।
- जसवंत सिंह–I की मृत्यु (1678 ई.) के बाद औरंगजेब ने अपने अधिकार क्षेत्र में लिया।
- औरंगजेब की मृत्यु के बाद अजीत सिंह ने जफर कुली खां से छीना।
मेहरानगढ दुर्ग में स्थित
- मोती महल
- फूल महल
- तख़्त विलास
- अजीत विलास
- उम्मेद विलास
- चोखेलाव महल
- बीचला महल
- शेरशाह की मजार
- भूरे खां की मजार
- शृंगार चौकी
- पुस्तक प्रकाश
- मंदिर
- नागणेची माता
- चामुंडा माता
- आनंदधन मंदिर
- मुरली मरोहर
- अनेक प्राचीन तोपें
- किलकिला
- शंभूबाण
- गजनीखांन
- जमजमा
- कड़क बिजली
- नुसरत
- गब्बार
- बिच्छू बाण
- घूड़घाणीद
- मीरबख्श
- रहस्य काल
- गजक
- मेहरानगढ़ दुःखान्तिका घटना
- 30 सितंबर 2008 (आश्विन नवरात्रा)
- जाँच आयोग – जसराज चौपड़ा कमेटी
- “देवताओं, परियों, फरिश्तों से निर्मित माना है”
- जलापूर्ति – राणीसर और पदमसर तालाब से
- नोट – जोधा ने कोडमदेसर तालाब का निर्माण किया (अपनी मां कोडमदे की स्मृति में)
- राव जोधा के पुत्र बीका: बीकानेर की स्थापना – 1488 ई. (अक्षय तृतीया)
सातलदेव (1489 – 1492 ई.)
- जोधा का छोटा पुत्र
- सातलमेर (जैसलमेर) कस्बे की स्थापना की।
- 1492 ई. में पीपाड़ (नागौर)/कोसाणा के युद्ध में अजमेर के मल्लू खां को पराजित किया।
- सातलदेव की पत्नी फूला भटियाणी ने जोधपुर में फूलेलाव तालाब का निर्माण करवाया।
घुड़ला उत्सव / नृत्य
- सातलदेव के समय प्रारंभ हुआ
- कारण – मल्लू खां के सेनापति घुड़ले खां को मारा था।
- मारवाड़ का प्रमुख नृत्य।
- समय – चैत्र शुक्ल अष्टमी
- वर्तमान में घुड़ला उत्सव को अंतरराष्ट्रीय ख्याति रूपायन संस्थान बोरून्दा (जोधपुर) ने दिलवाई।
- रूपायन संस्थान के संस्थापक – कोमल कोठारी एवं विजयदान देथा।
कोमल कोठारी –
- कपासन (चित्तौड़) निवासी
- मांगणियार और लंगा कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलवाई।
- नेहरू फैलोशिप प्राप्त।
- सम्मान – पद्मश्री 1983
- पद्मभूषण 2000,
- प्रथम राजस्थान रत्न पुरस्कार 2012 से सम्मानित।
विजयदान देथा –
- बोरुन्दा (जोधपुर) निवासी
- उपनाम – बिज्जी, राजस्थान का शेक्सपियर
- रचनाएँ – बातां री फुलवारी, महामिलन, अनोखा पेड़, सपनप्रिया, अलेखु हिटलर, तिडोराव आदि।
- इनके उपन्यास “दुविधा” पर मणि कॉल ने “पहेली” नामक फिल्म बनाई (अभिनेता – शाहरूख खान), जो ऑस्कर अवार्ड के लिए नामित हुई।
- सम्मानित पुरस्कार – राष्ट्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार 1974 ई., पद्मश्री 2007 ई., राजस्थान रत्न पुरस्कार 2012 से सम्मानित।
- 2011 ई. में साहित्य नोबेल के लिए नामित किया गया।
राव सूजा (1492–1515 ई.)
- राव बीका ने इनके काल में जोधपुर पर चढ़ाई की।
- वीरमदेव ने मेड़ता की स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापना की।
राव गांगा (1515–31 ई.)
- समकालीन दिल्ली सल्तनत – सिकंदर लोदी, इब्राहिम लोदी
- समकालीन मुगल शासक – बाबर व हुमायूं
- 1527 ई. में खानवा के युद्ध में राणा सांगा की सहायता की
- अपने पुत्र मालदेव को सेना सहित भेजा।
- 1529 ई. में सेवकी के युद्ध में दौलत ख़ाँ नागौर को पराजित किया।
- गांगा के पुत्र मालदेव ने गांगा की हत्या कर दी।
- कार्य –
- जोधपुर में गोगेलाव तालाब बनवाया।
- “गांगा की बावड़ी” बनवाई।
- सिरोही से लायी हुई श्यामजी की मूर्ति उनके नाम पर कर दी, जो “गंगश्याम” के नाम से प्रसिद्ध हुई।
राव मालदेव (1532–62 ई.)
- पितृहन्ता शासक
- खानवा के युद्ध में राणा सांगा की ओर से भाग लिया।
- 1532 ई. में बहादुर शाह के मेवाड़ पर आक्रमण के दौरानराणा विक्रमादित्य की मदद की।
- राज्य का विस्तार
- नागौर
- भाद्राजूण
- मेड़ता
- अजमेर
- सिवाणा
- जालौर
- 1536 ई. में जैसलमेर के राव लूणकरण की पुत्री उमादे से विवाह
- इतिहास में “रूठी रानी” के नाम से प्रसिद्ध।
- रूठी रानी
- जीवन तारागढ़ (अजमेर) में व्यतीत किया।
- अंतिम समय दत्तक पुत्र राम के साथ गुन्दोज से केलवा (राजसमंद) चली गई।
- मालदेव के मरने के बाद उनकी पगड़ी के साथ अनुवरण (सती) किया।
- शेरशाह के आक्रमण (1544 ई.) के समय मालदेव ने ईश्वरदास को लेने भेजा पर आशा बारहठ के व्यंग्य के कारण वह गून्दोज चली गई।
- मालदेव ने पराजित किये
- स्वामी वीरा (भाद्राजूण)
- दौलत खां (नागौर)
- डूंगर राठौड़ (सिवाणा)
- सिकंदर खां (जालौर)
- 1542 ई. में
- मेड़ता के वीरमदेव पर आक्रमण
- बीकानेर के राव जैतसी पर आक्रमण
- दोनों के राज्यों पर अधिकार कर लिया।
साहेबा(पाहेबा) का युद्ध – 1541 ई.
- युद्ध पक्ष – राव जैतसी (बीकानेर) व मालदेव
- परिणाम – राव जैतसी मारा गया, मालदेव की विजय।
- जैतसी का पुत्र कल्याणमल्ल शेरशाह के पास चला गया।
- मालदेव ने कूँपा को गवर्नर बनाया।
- 1540 ई. में मावली के युद्ध में
- मालदेव ने मेवाड़ शासक उदय सिंह को बनवीर को मारकर शासक बनने में सहायता की।
- मालदेव पर शेरशाह का आक्रमण – 1543–44 ई.
- मालदेव ने युद्ध से पहले ही मैदान छोड़ दिया।
गिरी सुमेल / सुमेल का युद्ध – 5 जनवरी 1544 ई.
- पक्ष – जैता व कूँपा और शेरशाह सूरी
- जैता व कूँपा (मालदेव के सेनापति) वीरगति को प्राप्त हुए।
- शेरशाह सूरी ने कल्याणमल (बीकानेर), वीरमदेव (मेड़ता) की सहायता से विजय प्राप्त की।
- जानकारी स्रोत – “तारीख-ए-शेरशाही” (अब्बास खां शेरवानी / शेखानी)
- शेरशाह कथन –
- “एक मुट्ठी बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान की बादशाही खो देता।”
- “काश जैता व कूँपा जैसे महान सेनापति मेरे पास होते तो मैं हिन्दुस्तान पर एक छत्तर राज करता।”
- युद्ध विजय के बाद घटनाएँ –
- शेरशाह ने मालदेव का पीछा किया।
- मालदेव ने सिवाणा दुर्ग में शरण ली।
- शेरशाह का जोधपुर पर अधिकार हो गया।
- शेरशाह ने ख़्वाश खां को जोधपुर का गवर्नर नियुक्त किया।
- वीरमदेव को मेड़ता दिया।
- कल्याणमल्ल को बीकानेर सौंप दिया।
- शेरशाह की मृत्यु (1545 ई.) के बाद –
- मालदेव ने जोधपुर, पोकरण, फलोदी, बाड़मेर, कोटड़ा, जालौर और मेड़ता पर पुनः अधिकार कर लिया।
- 1557 ई. में हरमाड़ा के युद्ध में –
- राणा उदय सिंह को पराजित किया।
- 1562 ई. में मालदेव की मृत्यु हो गई।
- फारसी इतिहासकार – अबुल फज़ल, निजामुद्दीन आदि ने मालदेव को “हसमत वाला बादशाह” कहा।
- नोट – “रूठी रानी” रचना केसरी सिंह बारहठ की है।
- साहित्य – मालदेव के समय विपुल साहित्य सृजित हुआ
- आसिया जी के दोहे
- आशा बारहठ के गीत
- ईसरदास के सोरठे
- जीनरात्रि कथा
- करणीदान रत्न के छप्पय आदि।
मालदेव के दरबारी विद्वान –
- आशानन्द
- “उमादे भटियाणी री कविता”
- “बाछा भारमली रा दुहा”
- “गोगाजी री पेड़ी”
- 1542 ई. के साहेबा युद्ध में भाग लिया।
- ईसरदासजी
- “हाला झाला री कुण्डलियां” (सूर सतसई)
- “देवीयाण”
- “हरिरस”
- प. राजस्थान के लोकदेवता हैं।
- मालदेव द्वारा निर्मित किले / दुर्ग
- मेड़ता
- रीयां
- पोकरण
- सोजत
- मालकोट (मेड़ता) इत्यादि।
- मालदेव के पुत्र –
- राम – गून्दोज
- उदयसिंह – फलोदी
- चन्द्रसेन – जोधपुर
- रायमल – सिवाणा
- मालदेव ने पत्नी स्वरूप दे के प्रभाव से तीसरे पुत्र चन्द्रसेन को उत्तराधिकारी घोषित किया।
राव चन्द्रसेन (1562–81 ई.) –
- मालदेव व स्वरूप दे का पुत्र।
- उपनाम
- मारवाड़ का प्रताप
- प्रताप का अग्रगामी
- भूला-बिसरा राजा शासक (नायक)
- विश्वेश्वरनाथ रेऊ – प्रताप से तुलना की।
- समकालीन शासक
- मुगल – अकबर
- मेवाड़ – उदयसिंह व प्रताप
- बीकानेर – कल्याणमल्ल, राय सिंह
- आमेर – भारमल, भगवंतदास
- चन्द्रसेन को अपने दोनों भाइयों (राम व उदयसिंह) के विरोध का सामना करना पड़ा।
- 1564 ई. – राम अकबर की शरण में सहायता लेने चला गया।
- 1564 ई. – अकबर ने हुसैन कुली बेग को भेज कर जोधपुर पर अधिकार कर लिया; चन्द्रसेन भाद्राजूण चला गया तथा मुगलों से संघर्ष किया।
नागौर दरबार – 1570 ई.
- उद्देश्य – अकबर की अधीनता स्वीकार करवाना।
- शुक्र तालाब (अकाल राहत कार्यों) का निर्माण करवाया।
- शामिल / भाग लेने वाले –
- हरराय भाटी (जैसलमेर)
- कल्याण सिंह व राय सिंह (बीकानेर)
- दुर्जनशाल हाड़ा (कोटा)
- चन्द्रसेन (भाद्राजूण)
- उदयसिंह (फलोदी) आदि।
परिणाम –
- कल्याणमल्ल तथा जैसलमेर शासक हरराय भाटी ने अधीनता स्वीकार की तथा वैवाहिक संबंध स्थापित किया।
- चन्द्रसेन ने भाग तो लिया पर अकबर का झुकाव अपने भाइयों राम व उदयसिंह की तरफ देखकर बिना अधीनता स्वीकार किये ही लौट गया।
- अकबर ने 1572–74 ई. तक रायसिंह को जोधपुर का गवर्नर नियुक्त किया।
- रायसिंह ने चन्द्रसेन का पीछा किया; –
- चन्द्रसेन भाद्राजूण, सिवाणा (मारवाड़ की संकटकालीन राजधानी), सोजत, सारण की पहाड़ियों के गांव सच्चियाप में चला गया, जहाँ 11 जनवरी 1581 को उसकी मृत्यु हो गई। सच्चियाप में छतरी (स्मारक) बना है।
- अन्य तथ्य –
- 1573 ई. – अकबर ने शाहकुली खां के नेतृत्त्व में सेना भेजी; जगतसिंह, केशवदास मेड़तिया, रायसिंह शामिल थे; इसने कल्ला राठौड़ को पराजित किया तथा सिवाणा दुर्ग में फत्ता राठौड़ को नियुक्त किया।
- 1575 ई. – जलाल खां के नेतृत्त्व में पुनः सेना सिवाणा पर भेजी; जलाल खां चन्द्रसेन व देवदास के हाथों मारा गया।
- कालांतर में शाहबाज खां (मुगल सेनापति) ने सिवाणा पर अधिकार कर लिया।
- पोकरण किले पर भाटियों का अधिकार – जनवरी 1576
- पोकरण का प्रशासक – पंचोल आनंद (चन्द्रसेन का प्रतिनिधि)
- अक्टूबर 1575 ई. – हरराय (जैसलमेर) ने पोकरण पर आक्रमण किया; चन्द्रसेन ने 1 लाख फदीए लेकर पोकरण का किला हरराय को दे दिया।
- चन्द्रसेन के साथी – राव सुखराज, सूजा, देवदास
- चन्द्रसेन ने लोहावट के युद्ध में उदयसिंह (भाई) को तथा नाडोल के युद्ध में राम (भाई) को पराजित किया।
- चन्द्रसेन पहला राजपूत शासक था जिसने अपनी रणनीति में किलों के स्थान पर पहाड़ों, जंगलों (प्रकृति प्रेमी) को प्राथमिकता दी।
- नोट – “जोधपुर राज्य री ख्यात” अनुसार चन्द्रसेन के सामंत वैरसल ने विश्वासघात कर भोजन में जहर दिया, जिससे उसकी मृत्यु हुई।
- “जोधपुर राज्य री ख्यात” में वर्णन – राव चन्द्रसेन तथा महाराणा प्रताप “कोरड़ा” गांव में मिले तथा राणा की हल्दीघाटी एवं कुंभलगढ़ युद्ध में अप्रत्यक्ष सहायता की।
- अकबर द्वारा 1581–83 ई. तक मारवाड़ “खालसा क्षेत्र” (सीधे केंद्र के अधीन) घोषित किया गया।
राजा उदयसिंह (1583–95 ई.) –
- चन्द्रसेन का भाई।
- 1583 ई. में मुगल अधीनता में बनने वाला मारवाड़ का प्रथम शासक।
- उदयसिंह ने अपनी पुत्री जोधाबाई / जगत गुसाई / मानीबाई का विवाह अकबर के पुत्र सलीम (जहाँगीर) से 1587 ई. में किया।
- खुर्रम (शाहजहाँ) जोधाबाई का ही पुत्र है।
- इस विवाह पर अकबर ने उदयसिंह को 1000 का मनसबदार बनाया।
- उदयसिंह के पुत्र किशन सिंह ने राठौड़ शक्ति का तीसरा केंद्र 1609 ई.में किशनगढ़ स्थापित किया।
- उदयसिंह की मृत्यु 11 जुलाई 1595 ई. को लाहौर में हुई।
सवाई राजा सूरसिंह (1595–1619 ई.) –
- सवाई राजा” की उपाधि अकबर द्वारा, साथ ही 2000 जात व 2000 सवार का मनसब।
- 1615 ई. मुगल–मेवाड़ संधि में खुर्रम के साथ सम्मिलित हुआ।
- जहाँगीर को रण-रावत व फौजी शृंगार युक्त हाथी भेंट किए।
- मोती महल (जोधपुर) का निर्माण करवाया।
महाराजा गजसिंह (1619–38 ई.)-
- उपाधि – **दलथम्मण** (फौजी को रोकने वाला)
- दलथम्मण – 1621 ई. जहाँगीर द्वारा
- “महाराजा” – 1630 ई. शाहजहाँ द्वारा।
- बीजापुर व कंधार अभियानों में अपनी वीरता दिखाई।
- गजसिंह ने अपने जीवनकाल में अपने छोटे पुत्र “जसवंत सिंह I “ को उत्तराधिकारी बना दिया, प्रेमिका अनार बेगम के प्रभाव में आकर बड़े पुत्र अमर सिंह को रुष्ट कर दिया।
- काव्य–संबंध
- हेमकवि –
- गुण भाषा चित्र
- गुण रूपक
- केशवदास गाडण – गजगुणरूपक
- अमर सिंह राठौड़ (नागौर)
- गजसिंह से नाराज़ होकर शाहजहाँ के पास चला गया।
- शाहजहाँ ने नागौर की जागीर दी।
- शाहजहाँ के दरबार में अपनी कटार से मीर बख्शी सलावत खाँ को मार दिया।
मतीरे की राड़ – 1644 ई.
- अमर सिंह (नागौर) और कर्णसिंह (बीकानेर) के बीच जाखनिया गाँव में युद्ध।
- उपाधि – कटार का धणी।
- मृत्यु – अमर सिंह के साले अर्जुन सिंह गौड़ ने हत्या की।
- नागौर में अमर सिंह की छतरी – 16 खंभों की।
जसवंत सिंह I (1638–78 ई.) –
- जन्म – 1626 ई., बुरहानपुर में।
- पिता की मृत्यु के समय अपने विवाह हेतु बूंदी में था।
- 1638 ई. में शाहजहाँ ने जसवंत सिंह को “राजा” एवं “टीका” का खिताब दिया।
- 1640 ई. में जोधपुर में राज्यारोहण उत्सव मनाया।
- 1645 ई. में शाहजहाँ ने आगरा का प्रबंध कार्य सौंपा।
- 1648 ई. में कंधार अभियान पर भेजा गया।
- उत्तराधिकार युद्ध से पूर्व शाहजहाँ ने जसवंत सिंह को 7000 जात व 7000 सवार का मनसब तथा मालवा की सूबेदारी दी।
- शाहजहाँ ने आसोपा के ठाकुर राजसिंह कूँपावत को 1000 जात व 400 सवार के मनसब के साथ जोधपुर का राज्य-मंत्री नियुक्त किया।
- औरंगजेब के उत्तराधिकार युद्धों में भूमिका –
- धरमत (मध्य प्रदेश) का युद्ध – 1658 ई.
- जसवंत सिंह ने दारा की तरफ से शाही सेना में औरंगजेब के विरुद्ध भाग लिया।
- क़ासिम खाँ के विश्वासघात से पराजित हुआ।
- जोधपुर लौट आया, जहाँ उदयपुरी रानी महारानी महामाया) ने महल के दरवाज़े बंद कर लिए।
- बर्नियर, मनूची, खाफी खाँ – इन लेखकों के अनुसार जसवंत सिंह जोधपुर पहुँचे।
- कवि श्यामलदास इसे सही मानते हैं, जबकि विश्वेश्वरनाथ रेऊ असत्य मानते हैं।
- खजुआ के युद्ध में शाही डेरों को लूटकर जोधपुर लौट गया।
- दोराई का युद्ध – 1659 ई.
- औरंगजेब के बादशाह बनने के बाद मिर्जा राजा जयसिंह की मध्यस्थता से औरंगजेब व जसवंत सिंह के बीच समझौता।
- 1659 ई. में औरंगजेब ने जसवंत सिंह के मनसब में बिना परिवर्तन उसे गुजरात का सूबेदार बनाया।
- 1662 ई. में मराठों के विरुद्ध शाइस्ता खाँ की सहायता के लिए दक्षिण भेजा,विशेष सफलता नहीं मिली।
- 1673 ई. में जसवंत सिंह को काबुल भेजा गया, बाद में जमरूद (अफगानिस्तान) जाने का आदेश।
- जमरूद – 28 नवम्बर 1678 ई. को जसवंत सिंह की मृत्यु।
- औरंगजेब का कथन – “आह! आज कुफ्र (धर्म-विरोध) का दरवाज़ा ढह गया।”
- धरमत (मध्य प्रदेश) का युद्ध – 1658 ई.
- जसवंत सिंह स्वयं विद्वान तथा विद्वानों के आश्रयदाता थे।
- प्रमुख रचनाएँ –
- भाषा-भूषण (रीति व अलंकार ग्रंथ)
- आनंद विलास
- गीता महात्म्य
- अप्रत्यक्ष सिद्धांतसार
- सिद्धांत बोध
- अनुभव प्रकाश
- प्रबोध चंद्रोदय
- दरबारी विद्वान –
मुहणौत नैणसी –
- मुख्यतः – मारवाड़ के राठौड़ों का इतिहास,साथ ही अन्य रियासतों का भी वर्णन –
- जैसे गुर्जर–प्रतिहार की 26 शाखाएँ,
- गोहिलों की 24 शाखाएँ।
- राजस्थान की पहली ख्यात।
- मारवाड़ रा परगना री विगत (ख्यात) –
- उपनाम – राजस्थान का “गजट / गज़ेटियर” (राजपत्र)
- मारवाड़ का प्रशासनिक ग्रंथ –
- सामाजिक–आर्थिक स्थिति व जनगणना की जानकारी।
- कर्ज से परेशान होकर भाई सुंदरदास के साथ जेल में आत्महत्या (लगभग 60 वर्ष की आयु)।
- नवीन कवि
- सूरत मिश्र
- नरहरिदास
- बनारसीदास
- रूपा धाय – जसवंत सिंह की धाय; मेड़ती दरवाजे में इनके लिए एक बावड़ी बनवाई गई।
- पत्नी अतीरंग दे – जानसागर तालाब का निर्माण।
- पत्नी जसवंत दे – राई का बाग / कल्याण सागर का निर्माण
- वर्तमान नाम – रातानाड़ा।
- नोट – जसवंत सिंह ने महाराष्ट्र में “जसवंतपुरा” नगर बसाया।
अजीत सिंह (1679–1724 ई.)-
- जसवंत सिंह की मृत्यु की सूचना मिलते ही औरंगजेब ने जोधपुर को “खालसा” घोषित किया तथा दक्षिण से राव अमर सिंह (नागौर) के पौत्र इन्द्र सिंह को जोधपुर की जागीर देकर “राजा” की उपाधि दी।
- जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद उनके दो पुत्रों का जन्म –
- अजीत सिंह
- दलथम्भन
- अजीत सिंह को लेकर जोधपुर के राठौड़ सरदार जमरूद से दिल्ली आए, दिल्ली में किशनगढ़ के राजा रूपसिंह की हवेली में ठहरे।
- वहाँ से जोधपुर के लिए रवाना हुए,
- बीच रास्ते में दलथम्भन की मृत्यु हो गई (जोधपुर री ख्यात) – दल में दुर्गादास राठौड़ भी थे।
दुर्गादास राठौड़ –
- उपनाम –
- मारवाड़ का उद्धारक
- अणबिंधिया मोती
- राठौड़ों का यूलीसेज – कर्नल टॉड
- जन्म व वंश –
- निवासी – सालवा गाँव (जोधपुर)
- पिता – आसकरण (महाराजा जसवंत सिंह का मंत्री)
- जागीर – लूणवा
- अजीत सिंह की रक्षा
- गौराधाय व मुकुंददास खींची की सहायता
- औरंगजेब के शाही हरम से अजीत सिंह को छुड़ाया।
- कालिन्द्रि गाँव (सिरोही) में जयदेव ब्राह्मण के पास रखा।
- मेवाड़ शासक राजसिंह प्रथम से शरण दिलाई।
- मेवाड़ का संरक्षण –
- 12 गाँवों सहित केलवा की जागीर
- राजसिंह के साथ राठौड़–सिसोदिया गुट निर्माण।
- औरंगजेब से संघर्ष –
- अवधि – 1678–1708 ई.
- 30 वर्षों तक लगातार संघर्ष
- मुगल संबंध –
- ईश्वरदास नागर के कहने पर अकबर के पुत्र-पुत्री बुलंद अख्तर शहज़ादी सफ़िय्यत-उन-निसा – को इस्लामी शिक्षा दी।
- बाद में औरंगजेब को सौंपा
- इनाम –
- 3000 जात
- 2000 सवार
- परगने – मेड़ता, जैतारण, सिवाणा
- अजीत सिंह से अन-बन –
- मेवाड़ शासक अमरसिंह द्वितीय के पास गए
- जागीर – विजयपुर व रामपुरा
- अंतिम जीवन –
- अंतिम समय – उज्जैन (शिप्रा नदी)
- मृत्यु – 22 नवम्बर 1718 ई.
- शिप्रा नदी पर छतरी
- विशेष तथ्य –
- औरंगजेब ने नकली अजीत सिंह का नाम “मुहम्मदीराज” रखा।
- इसे अपनी पुत्री जेबुन्निसा को सौंपा
महाराजा अजीत सिंह (1708–1724 ई.)
- देबारी समझौता – 1708 ई.
- मारवाड़ का शासक घोषित
- 1715 ई. में फर्रुखसियर से पुत्री इंद्र कुंवरी का विवाह
- अंतिम राजपूत–मुगल विवाह
- विद्वान शासक – ग्रंथ रचना
- गुण सागर
- दुर्गापाठ भाषा
- निर्वाण दूहा
- अजीत सिंह रा कहा दूहा
- गज उद्धार
- निर्माण कार्य –
- मूलनायक मंदिर
- फतेह महल
- घनश्याम मंदिर
- उपाधि – डॉ. जी.एच. ओझा द्वारा “कान का कच्चा”
- 1724 ई. में पुत्र बख्त सिंह द्वारा हत्या कर दी गई।
- गौराधाय –
- अजीत सिंह की धाय माँ
- मारवाड़ की पन्नाधाय
- छतरी – जोधपुर
अभय सिंह (1724–1749 ई.)
खेजड़ली आंदोलन –
- 28 अगस्त 1723
- अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्त्व में
- 363 बलिदान (294 पुरुष)
- अमृता देवी वन्य जीव संरक्षण पुरस्कार
- विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला – भाद्रपद शुक्ल दशमी
- गुजरात विजय – सर बुलंद खां पर विजय
- हुरड़ा सम्मेलन में भाग
- दरबारी विद्वान –
- करणीदान – सूरज प्रकाश, विषदशृंगार
- वीरभाण – राजरूपक
- जगजीवन भट्ट – अजितोदय, अभयोदय
- सुरति मिश्र – अमरचंद्रिका
राम सिंह (1749–1751 ई.) –
- अभय सिंह का पुत्र
- जालौर परगने को लेकर बख्त सिंह से संघर्ष
बख्त सिंह (1751–1752 ई.) –
- राम सिंह से जोधपुर छीना
- अपने पिता अजीत सिंह की हत्या
विजय सिंह (1752–1793 ई.)-
- शाहआलम द्वितीय से टकसाल की अनुमति
- विजयशाही सिक्के
- राठौड़–कच्छावा गुट
- तुंगा युद्ध – 1787 ई.
- पाटन युद्ध – 20 जून 1790 ई.
- गुलाब राय को मारवाड़ की नूरजहाँ और विजय सिंह को
- जहाँगीर का नमूना (कवि श्यामल दास ने )
- गुलाब राय का प्रभाव
- शासक बनाया गया – भीम सिंह
भीम सिंह (1793–1803 ई.)-
- कृष्णा कुमारी घटना
मानसिंह (1803–1843 ई.) –
- उपनाम – मारवाड़ का संन्यासी राजा
- महामंदिर का निर्माण (नाथ संप्रदाय की प्रमुख पीठ)
- गिंगोली युद्ध – 13 मार्च 1807
- सहायक संधियाँ – 1803, 1818
- मान पुस्तकालय
- जोधपुर लीजन – 1835 (एरिनपुरा)
- पॉलिटिकल एजेंसी – 1839
- 1832 के अजमेर दरबार में अनुपस्थित
तख्त सिंह (1843–1875 ई.) –
- 1857 की क्रांति में अंग्रेजों की सहायता
- मेयो कॉलेज को 1 लाख रु. दान
- प्रथम छापाखाना व विद्यालय
- तोप सलामी 17 से 15
जसवंत सिंह द्वितीय (1873–1895 ई.) –
- अंग्रेज भक्त शासक
- नगर पालिका – 1884
- बाल विवाह प्रतिबंध – 1885
- आर्य समाज स्थापना – 1883
- दयानंद सरस्वती की मृत्यु – 30 अक्टूबर 1883
- प्रथम जनगणना – 1881
- जसवंत सागर – 1892
सरदार सिंह (1895–1911 ई.) –
- पोलो का केंद्र – जोधपुर
- टेलीफोन सेवा प्रारंभ
- जसवंत फीमेल हॉस्पिटल
- बॉक्सर युद्ध – 1900
- एडवर्ड रिलीफ फंड – 1910
सुमेर सिंह (1911–1918 ई.) –
- दिल्ली दरबार – 1911
- WW–I में भाग
- BHU को 2 लाख रु. सहायता
उम्मेद सिंह (1918–1947 ई.) –
- वास्तविक शक्ति – डोनाल्ड फील्ड
- उम्मेद भवन – 1929
- संविधान सभा प्रतिनिधि – जय नारायण व्यास
- विधानसभा गठन – 1945
हनुवंत सिंह (1947–1949 ई.) –
- पाकिस्तान में विलय का प्रयास
- 9 अगस्त 1947 – भारत में विलय
- वृहत राजस्थान में सम्मिलित
