अलवर का ‘नरूका’ वंश

अलवर का ‘नरूका’ वंश राजस्थान का इतिहास का एक प्रमुख राजपूत वंश है, जिसने अलवर राज्य की स्थापना कर क्षेत्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कच्छवाहा वंश की शाखा नरूका राजपूतों ने साहस, प्रशासनिक दक्षता और सैन्य शक्ति के बल पर अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित की। इस वंश का योगदान अलवर के सांस्कृतिक और राजनीतिक विकास में विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है।

उत्पत्ति व पृष्ठभूमि

  • अलवर में कच्छवाहा वंश की ‘नरूका’ शाखा का शासन था।
  • नरूका – कोकिलदेव के वंशज ‘नरू’ की संतान को कहा गया।
  • मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम ने नरूका कल्याणसिंह को ‘माचेड़ी’ की जागीर प्रदान की।
  • बाद में इन्हीं नरूका ठाकुरों से अलवर रियासत का उदय हुआ।

प्रतापसिंह (1775–1790 ई.) – 

  • पिता – मोहब्बतसिंह।
  • पद – माचेड़ी का सामन्त (नरूका प्रमुख)।
  • 1774 ई. में मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय ने
  • ‘राव राजा’ की उपाधि दी तथा 5000 का मनसब प्रदान किया।
  • जाट शासक रणजीतसिंह के विरुद्ध मुगल पक्ष की ओर से सैन्य सहायता दी।
  • 25 दिसम्बर 1775 को प्रतापसिंह अलवर का स्वतंत्र शासक बना तथा अलवर को अपनी राजधानी बनाया।
  • 1755 में रणथम्भौर दुर्ग को मराठों के आक्रमण से बचाया।
  • मांडवा–मण्डौली युद्ध (1767 ई.) में जयपुर शासक माधोसिंह प्रथम की भरतपुर के जवाहरसिंह के विरुद्ध सहायता की।
दरबारी विद्वान –
  • जाचक जीवण, जिन्होंने ‘प्रताप रास’ (प्रतापरासौ) की रचना की।
चित्रकला – 
  • शिवकुमार व डालूराम नामक चित्रकार जयपुर से अलवर आए और अलवर चित्रशैली के विकास में सहायक बने।
प्रमुख निर्माण–स्थापत्य – 
  • लगभग 1770 ई. – राजगढ़ दुर्ग का निर्माण।
  • टहला दुर्ग (टहला भुर्ज) का निर्माण।
  • 1772 ई. – मालखेड़ा दुर्ग का निर्माण।
  • बलदेवगढ़ दुर्ग का निर्माण।
  • प्रतापसिंह ने नरूका शक्ति को संगठित कर
  • अलवर को स्वतंत्र रियासत के रूप में स्थापित किया।

बख्तावरसिंह (1790–1815 ई.)

  • प्रतापसिंह का दत्तक पुत्र।
  • लसवाड़ी का युद्ध (1803 ई.)
    • पक्ष – बख्तावरसिंह बनाम मराठे।
    • सहयोगी – अंग्रेज सेनापति जनरल लेक।
    • परिणाम – मराठों ने बख्तावरसिंह की सेना को पराजित कर दिया।
  • अंग्रेजों से संधि का लाभ – तिजारा, टपूकड़ा व कठुम्बर के परगने अलवर राज्य में मिला दिए गए।
  • 1793 ई. में अपने निवास हेतु अलवर सिटी पैलेस का निर्माण कराया।
  • 14 नवम्बर 1803 को गवर्नर जनरल लार्ड वैलेजली के साथ सहायक संधि (Subsidiary Alliance) की ब्रिटिश प्रतिनिधि – लॉर्ड लेक थे।
  • मृत्यु के बाद उत्तराधिकार–संघर्ष
    • पक्ष 1 – बलवन्तसिंह (बख्तावरसिंह का पुत्र)।
    • पक्ष 2 – विनयसिंह (बन्नेसिंह), जो मूसी महारानी (बख्तावरसिंह की प्रेयसी / दासी) का पुत्र था।
  • अंग्रेज सरकार ने कुछ समय तक विनयसिंह व बलवन्तसिंह – दोनों को संयुक्त शासक माना।
  • विनयसिंह के दबाव में बलवन्तसिंह को केवल नीमराणा व तिजारा की जागीर दी गई।
  • बलवन्तसिंह की मृत्यु के बाद नीमराणा व तिजारा दोनों को पुनः अलवर रियासत में मिला दिया गया।
  • बख्तावरसिंह – कवि रूप में ‘बख्तेश’एवं ‘चन्द्रसखी’ उपनाम से काव्य–रचना करते थे।

विनयसिंह (बन्नेसिंह) (1815–1857 ई.) – 

  • बख्तावरसिंह की दासी ‘मूसी’ का पुत्र होने के कारण उसकी माता ‘मूसी महारानी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।
  • स्थापत्य व जल–संरचना
    • मूसी महारानी की छतरी –
    • अलवर में मूसी महारानी की स्मृति में भव्य छतरी का निर्माण कराया।
    • 1845 ई. में अपनी रानी ‘शीला’ के लिए रूपारेल नदी पर सिलीसेढ़ झील का निर्माण करवाया।
    • तथा सिलीसेढ़ महल बनवाया, जिसे बाद में ‘राजस्थान का नन्दन–कानन’ कहा जाने लगा।
  • रघुनाथगढ़ दुर्ग –
    • मेव समुदाय के बार–बार आक्रमण से सुरक्षा हेतु बनवाया।
  • 1857 की क्रान्ति – 
    • विनयसिंह – अंग्रेज समर्थक शासक था।
    • उसके दीवान फैज़ुल्ला खाँ विद्रोही व क्रान्तिकारियों के समर्थक थे तथा अंग्रेजों का विरोध करते थे।
    • विनयसिंह के शासनकाल में अलवर में प्रशासनिक नियन्त्रण व सुरक्षा–संरचना अपेक्षाकृत मजबूत की गई।

शिवदानसिंह (1857–1874 ई.) – 

  • अल्पकालीन शासनकाल रहा।
  • 1857 के अशांत वातावरण में गद्दी पर आए और शीघ्र ही हटा दिए गए।

मंगलसिंह (1874–1892 ई.) – 

  • मेयो कॉलेज, अजमेर के प्रथम विद्यार्थी थे।
  • आधुनिक शिक्षित भारतीय राजकुमारों की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे।
  • 1888 ई. में अंग्रेजों ने इन्हें ‘महाराजा’ की उपाधि प्रदान की।

महाराजा जयसिंह (1892–1937 ई.) – 

  • शिक्षा व दान–कार्य – 
    • बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को आर्थिक सहायता दी।
    • अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को आर्थिक सहायता दी।
    • सनातन धर्म कॉलेज, लाहौर को भी आर्थिक सहायता प्रदान की।
  • राजनैतिक भूमिका – 
    • ‘चेम्बर ऑफ प्रिंसेज़’ को अधिक भारतीय नाम ‘नरेन्द्र मण्डल’ देना पसंद किया।
    • प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग लेकर
    • प्रजातांत्रिक / लोकतांत्रिक शासन–व्यवस्था की माँग रखी।
  • 1925 – नीमूचाणा हत्याकाण्ड के समय
    • किसान–आन्दोलन के दमन में अलवर प्रशासन द्वारा भारी गोलीबारी हुई।
  • 1933 – तिजारा दंगों के बाद ब्रिटिश सरकार ने जयसिंह को गद्दी से हटा दिया।
  • भाषा, समाज–सुधार व प्रशासन
    • ‘हिन्दी’ को अलवर राज्य की राजभाषा घोषित किया।
    • (नोट – भरतपुर में महाराजा किशनसिंह ने भी हिन्दी को राजभाषा घोषित किया था।)
    • बाल विवाह व ‘अनमेल विवाह’ (असमान सामाजिक–आर्थिक स्तर के विवाह) पर 10 दिसम्बर 1903 के आदेश से प्रतिबंध लगाया।
    • तम्बाकू के सेवन पर प्रतिबंध लगाया।
    • मृत्युभोज पर रोक लगाई।
    • स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को बढ़ावा दिया।
    • अलवर में पंचायतों की स्थापना कर स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहित किया।
  • निर्माण व स्थापत्य – 
    • जयसमन्द बाँध का निर्माण करवाया।
    • ड्यूक ऑफ एडिनबर्ग के अलवर आगमन पर सरिस्का महल का निर्माण करवाया।
  • अंत – 
    • 1933 के बाद पदच्युत होकर पेरिस चले गए।
    • 1937 ई. में पेरिस में उनकी मृत्यु हो गई।

तेजसिंह (1937–1948 ई.) – 

  • अलवर रियासत के अंतिम शासक थे।
  • भारत की स्वतंत्रता के समय भी यही शासक थे।
  • महात्मा गाँधी की हत्या (1948) के बाद तेजसिंह तथा प्रधानमंत्री नारायण भास्कर खरे संदेहास्पद व्यक्तियों की सूची में शामिल किए गए।
  • जाँच व मुकदमे के बाद न्यायालय ने तेजसिंह को दोषमुक्त कर छोड़  दिया।
  • 18 मार्च 1948 को अलवर रियासत ‘मत्स्य संघ’ में विलय हो गई।
  • इसके साथ ही अलवर का नरूका राज्य समाप्त हो कर भारतीय संघीय ढाँचे का अंग बन गया।
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